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बुधवार, 12 सितंबर 2012

अपनी कहो कुछ मेरी सुनो



जन्म लेते.... मृत्युपर्यंत, शुरू होती है एक अंतहीन यात्रा . कभी धूप, नहीं नहीं अधिक धूप,दर्द,धोखा....तब होता है अनुभवों का सिलसिला,हर बार
कुछ नया,सोच से परे,स्तब्ध करनेवाले ... ऐसे ही अनुभवों की अभिव्यक्ति के साथ मिलते है कालीपद प्रसाद से http://kpk-vichar.blogspot.in/2012/09/blog-post_10.html
के विचारों की भूमि पर -
न जाने कितने बार सोया
कितने बार जागा
कुछ भी याद नहीं मुझको।
पर एक बात मुझे याद है ...
"हर बार जब सोकर उठता हूँ
अपने को एक नये लिबास में ,
और एक नया रास्ते में पाता हूँ।" .... हर बार एक नया रास्ता, नए संकल्प, घबरायी सी मनःस्थिति ....


क्षितिजा - जो भ्रम से परे सत्य है...जहाँ हमारी पहुँच नहीं, उसे न भ्रम कह सकते हैं न असत्य ...रमाकांत की क्षितिजा कभी प्रेयसी,कभी परछाईं सी -
जो बनी रहना चाहती है क्षितिजा अपने अंदाज में ...

यादों की शक्ल कभी चाँद सी,कभी सांझ सी,कभी कौतुहल, कभी निराशाजनक ...
http://rajeshakaltara.blogspot.in/2012/09/blog-post.html इसमें कवि राजेश सिंह ने यादों के नश्वर शरीर को जुगनू सा प्रतिविम्बित
किया है,जो छिपकिली का ग्रास यानि समय का ग्रास बनने को अग्रसर है ...

एहसासों का सागर और उसकी लहरें .... कभी जीवंत,कभी व्याकुल,कभी भयाक्रांत - http://ehsaaskasaagar.blogspot.in/2012/09/blog-post.html
कहता हूँ जो जी चाहे करता हूँ ...
चाहता हूँ अच्छा,
अच्छे की चाह में पल पल मरता हूँ !
हार कर एक दिन टूट कर बिखर जाउंगा ......
सोच सोच तनहईयों मैं आह भरता हूँ !
मैं डरता हूँ ............ कितनी बड़ी सच्चाई है, टूटा हुआ आदमी भी चलता है,पर एकांत में अनगिनत संभावनाओं की सोच से डरता है !

आदमी का चेहरा और आदमी का मन - उदासीन चेहरा मरने की सोच रहा है या जीवन की सही दिशा ढूँढने में चिन्तनशील है,इसे अक्षरशः कहना संभव नहीं,
सही भी नहीं . आक्रोश के भी अलग अलग मायने होते हैं - कोई मारने मिटाने की सोचता है, कोई मरने की , कोई अपनी गलती पर, कोई चूक जाने पर
आक्रोशित होता है . फेसबुक का एक ऐसा ही नज़रिया अर्चना राज जी के शब्दों में -


वैसे...तुम जो चाहे करो
तुम्हारे कदम से
न मेरा प्रेम विवादित होगा
न मेरी ख़ामोशी मेरी व्यथा तुम्हें समझा सकेगी
....... यह जो है
सिर्फ मेरा है .... सोनिया बहुखंडी गौड़ की सोच व्यथा कई संभावनाओं को उकेरती है -
वैसे विवादित विषय अमर हो जाते हैं, तो चलो प्रेम को अमर होने दो ...

सीता की पीड़ा - जनक की बेटी अवध की रानी सीता भटकी वन वन में
राह अकेली रात अँधेरी ........ पर कैसे समझोगे इस पीड़ा को तर्क की कसौटी पर या सिर्फ राम की मर्यादा को
सोचकर !!!स्नील शेखर और http://snielshekhar.blogspot.in/2012/07/blog-post_9393.html

भाव कभी आँगन में कभी आकाश में तो कभी पाताल में और लेखक .... साथ साथ .........
उनींदी आँखों को भला लगता है जब धूप का एक टुकड़ा प्रातः संगीत बन आँगन में, दहलीज पर, छत पर, खिड़कियों से छनकर कमरे में आता है
और आंखमिचौली खेलता है . धूप कभी यहाँ तो कभी वहाँ ..... तो कभी बिल्कुल पास एकाकार होता माही के एक टुकड़े धूप जैसा -


ज़रूरी नहीं कि सबकुछ देखा ही जाए,सुना ही जाए .... स्थिति गंभीर है . बेहतर हा अमल कीजिये संतोष त्रिवेदी की इस बात पर, जो देखन में छोटन
लगे,पर घाव करे, यानि सीख दे गंभीर http://www.santoshtrivedi.com/2012/09/blog-post_10.html


मेहंदी लड़की का सौन्दर्य,दुल्हन की नजाकत, सौभाग्य प्रतीक ... कभी यही मेहंदी चपल चाल बनती है, कभी आँखों के पानी से धुल जाती है...
पूनम कासलीवाल और उनकी अभिव्यक्ति http://kasliwalpoonam.blogspot.in/2012/09/blog-post.html


वंदना के साथ चलना होगा नदी तक ... भावनाओं की गहराई तक जाना तो होगा न http://vandana-kuchhkahe.blogspot.in/2012/09/blog-post_10.html
संशय,अवचेतना से आगे शिवाकार लेती नदी की चाल से रूबरू होना होगा ...
क्या यहाँ कोई द्वार है
आस्था का
चेतना विश्वास का
क्या द्वार के पार
बहती होगी कोई नदी
पत्थरों को
शिवाकार बनाती हुई
तो चलो ...
नदी तक चलें ....


फिर वही ज़िन्दगी,फिर वही घुमावदार रास्ते, फिर वही भूलभुलैया,वही प्रश्न-क्या खोया क्या पाया ... मंटू कुमार के मन के कोने से भी
यही आवाज़ आ रही है - http://mannkekonese.blogspot.in/2012/09/blog-post_9.html
पहले कच्चे घर मे,
पक्के दिल वाले मिलते थे
अब पक्के घर मे कच्चे दिल वाले मिलते हैं,यहाँ
ये मै कहाँ आ गया...
हँसते-मुस्कुराते चेहरे बेशक लगते हैं प्यारे,
पर मुस्कुराहट के पीछे अब
कोई मतलब जुड़ा है,यहाँ
ये मै कहाँ आ गया... निरुत्तर है मन,निरुत्तर दिशाएं,निरुत्तर मुखौटे , ............... कहो कहाँ जाएँ ?

कोई राह तलाशती हूँ और आती हूँ फिर यह कहने कि अपनी कहो कुछ मेरी सुनो ....

5 टिप्‍पणियां:

  1. यह तरीका बढ़िया है ।
    .
    .
    आपका आभार रश्मि दी !

    उत्तर देंहटाएं
  2. राहें तलाशती आप और उनके अनुसरण में हम सब साथ - साथ हैं ... आपके
    सादर

    आभार

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  3. सभी रचनाएँ सुन्दर......
    प्रस्तुतीकरण लाजवाब....
    आभार रश्मि दी.

    अनु

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  4. मेरी रचना को यहाँ स्थान देने के लिए,आपका बहुत-बहुत धन्यवाद...

    अन्य सभी बेहतरीन लिंक ..आभार |

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  5. Thnk u so much 4 giving me space here...and other links are fab...:)

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