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शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजे ...8



प्यार में शब्दों को कभी छूकर देखा है 
आँखों में काजल की तरह भरा है
भीड़ के भय में उसका संरक्षण महसूस किया है
उड़ते बादलों की धवलता में उसे पाया है
चिड़िया के बेफिक्र गान में सुना है 
ऊँचे टीले से उसकी पुकार सुनी है 
ख़ामोशी में उसे मुखर पाया है 
प्यार की कहानी में पात्रों की परिधि में 
खुद को देखा है ?????
देखा है
जाना है
पाया है - तो यकीन करो
यही प्यार है :)


इसी प्यार के खुमार में -


पता नहीं क्यूँ 
मन हो रहा है 
इस वक़्त 
एक सुलगी सी कविता लिखने का 
कुछ - कुछ मुझ जैसी
मेरे प्यार के जैसी .. १७ साला 
या एक coffee house में 
एक ग्लास पानी के जैसी
जो मेरे होठों से लग कर 
गुजरी थी .. तुमसे ही कहीं 
पता नहीं क्यूँ 
मन हो रहा है इस वक़्त 
एक नीले रंग की साड़ी पहनने का 
खारे पानी के जैसी .. नमकीन स्वाद वाली 
जिसे पहने देख कभी तुम्हारा दिल करा था 
मुझे गले लगाने का 
तब शायद तुम्हारे गर्दन पर ठहरे 
उस काले तिल को छू पाती मैं 
अपनी सुलगी सांसों से तुम्हें .. ख़त्म कर पाती मैं
जिंदा रहने की ख्वाइश तुममें .. कहीं जगा पाती मैं 

और खुद भी जी पाती 
उम्र भर के लिए 
बिना सुलगे ..
बिना बिखरे ..

मंजीत  ठाकुर  - http://gustakh.blogspot.in/

प्यार,
प्यार कोई पाखी तो नहीं,
कि तुमने गुलेल चलाया..
और फुर्र-से उड़ गया वो।

प्यार,
प्यार कोई रोटी तो नहीं,
तुमने पकाया-खाया,
और फट् से फना हो गया वो।

प्यार,
प्यार कोई शब्द तो नहीं,
तुमने पूछा, मैंने बताया
और शब्दकोष या स्क्रीन पर,
चस्पां हो गया वो।

प्यार,
प्यार तो कोई बीज है शायद,
उस पेड़ की, जिसकी जड़े बडी गहरी हैं,
हममें-तुममें जो नदी के वेग-सा समाया है,
हमारा-तुम्हारा असली सरमाया है।

कृष्ण बिहारी - http://swaarth.wordpress.com/2011/01/01/shashwatrahegapyar/

तुम्हे देखने के लिये 
कभी पीछे नहीं मुड़ा मैं
गुजरते वक्त्त के साथ-साथ
तुम चलती रही हो साथ ही मेरे
एक परछाई की तरह
सम – विषम राहों पर।

दूरियों का भी मुझे
कभी हुआ नहीं एहसास
ऎसा भी लगा नहीं कभी
कि तुम नहीं हो मेरे पास
तुम्हारी याद रह रही है
मेरे साथ
एक सघन विश्वास की तरह
आस्था बनकर।

तुम्हारे लिखे प्रेम-पत्रों को
इसलिये नहीं पढ़ता बार-बार
कि तुम्हारी याद को
रखना है ताजा
नहीं ऐसा नहीं है…
पत्र नहीं पढ़ता हूँ मैं
तुम्हे पढ़ता हूँ
एक महाकाव्य की तरह
जिज्ञासु होकर
और पाता रहता हूँ ब्रहमानंद।

अरसा गुजरने के बाद भी
भूल पाता है कोई
एक बार बस गई मेंहदी की गंध
अपनी आत्मा में रचाकर, बसाकर।

तुम मीरा हो, राधा हो
मेरे लिये
परकाया प्रवेश की तरह
उतरती हो तुम उनमें
और इच्छा धारियों की तरह
मेरा प्रेम
धरता रहा है रुप
ढ़ालता रहा है स्वयं को
तुम्हारे अनुरुप
होता रहा है युवा और नवीन
आने वाली पीढ़ियों के लिये
एक अमिट अनुभव की तरह
थाती बनाकर।

किसी को यकीन दिलाने का
कसमें खाने का
प्रश्न ही नहीं उठता
क्योंकि
मरकर भी प्रेम
कभी नहीं मरता
शाश्वत है
और शाश्वत रहेगा प्यार
धरती पर।

प्यार न मिटा है,न मिटेगा .......... क्रमशः 

4 टिप्‍पणियां:

  1. प्यार न मिटा है,न मिटेगा ---- 100%true

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  2. किसी को यकीन दिलाने का
    कसमें खाने का
    प्रश्न ही नहीं उठता
    क्योंकि
    मरकर भी प्रेम
    कभी नहीं मरता
    शाश्वत है
    और शाश्वत रहेगा प्यार
    धरती पर।
    यक़ीनन ...

    उत्तर देंहटाएं
  3. हाँ यही प्यार है ...पात्रों की परिधि में ....गान में ...उड़ान में ...तान में ....प्राण में ....महसूस किया है ...तो यही प्यार है.....यकीनन ...उम्दा ...

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