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रविवार, 30 सितंबर 2012

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजे ...10




आज गाहे गाहे प्रेम को पढ़िए चंडीदत्त शुक्ल की कलम से http://chauraha1.blogspot.in/ - दिल से बेहतर कोई किताब न थी, न होगी... प्रेम सिर्फ चाँदनी नहीं,अमावस्या भी है...जेठ की दोपहरी भी,बारिश के बाद की धूप भी....हर रूप में प्रेम न हो तो थोड़ा थोड़ा जीने,थोड़ा थोड़ा मरने का एहसास कैसे होगा ! प्रेम कभी कसम,कभी आंसुओं से सराबोर सारी कसमों से दूर... प्रेम में डूब जाओ तो हर पात्र में अपनी झलक आती है . तभी तो आज भी आँखें मुस्कुराती हैं सुनकर - 'वो तेरा कोठे पे नंगे पाँव आना याद है,हमको अब तक आशिकी का वो ज़माना याद है' ... है न ?

प्रेम,
तुम्हारा पीछे छूटना तय ही था
शायद
तुम्हारे आने से पहले से
तुम फिसल ही जाते हो
दिल की गिरह से जब-तब
बल्कि,
जब, तब तुममें डूबे होते हैं हम।
तब, जब तुम्हारी होती है सबसे ज्यादा ज़रूरत,
तुम होते हो गैरहाज़िर
हमारी ज़िंदगी से।
और,
एक के बाद एक कर गुज़रते दिनों में
तुम हो जाते हो गुजरे दिनों को एक गैरज़रूरी-सा एहसास।
फिर,
ज्यूं ही हम निश्चिंत होकर,
कुछ दर्दभरे गीत सुनते हुए
चंद कविताएं लिखकर
कुछ ज़र्द चिट्ठियां उलटते हुए,
निपटाते रहते हैं घर के ज़रूरी कामकाज,
ऐन उन्हीं के बीच,
गहरी टीस बनकर तुम सिर उठा खड़े हो जाते हो...
क्या, यही याद दिलाने के लिए
हां, तुम मौजूद हो.
कभी नहीं गुजरे,
न ही तुम गैरज़रूरी थे।
सच है, तुम्हारा पीछे छूटना,
छूटना है बचपन की तरह ही,
जो न होकर भी हाज़िर होता है हमारे मन में सदैव।
यूं ही,
तुम भी तो अपनी छायाओं में,
हमारे होंठों और आंखों पर हरदम अट्टहास करते रहते हो,
कभी मुस्कान और आंसू बनकर,
तो कभी कटाक्ष की शक्ल में कहते हुए,
बिना प्रेम के जियोगे? जीकर दिखाओ तो जानें!..............

इतना आसान नहीं प्रेम के बगैर जीना...प्रेम अग्नि,प्रेम कुंदन,प्रेम ही है जौहरी ... प्रेम आंसू,प्रेम गंगा,प्रेम ही होती त्रिवेणी !

पंद्रह सौ साल पहले
अनजान कबीले की उस औरत ने
पहनी होगी कलाई में चूड़ी
टेराकोटा से बनी

टेराकोटा, जो होती है लाल और काली
उससे बुनीचूड़ी का एक टुकड़ा
जो न बताओ तो नहीं लगता
श्रृंगार का जरिया

वो चूड़ी पहनकर वो औरत हंसी होगी
होंठों को एक दांत से दबाकर
पर तुम्हारी तो आंख से काजल बहने लगता है
तुम थर्राए होंठों से
पूछती हो
जिन हाथों में रही होगी ये चूड़ी
उन्हें किसी ने चूमा होगा ना

तुम सिहर उठती हो ये सोचकर
वक्त में घुल गई होगी वो औरत
मिट गया होगा उसका अस्तित्व
पर सुनो...चूड़ी कहां घुली?
नहीं नायकीन मानो
मिट्टी कभी नष्ट नहीं होती
चूड़ी टुकड़ा-टुकड़ा टूटी
लेकिन खत्म नहीं हुई
तुमने ही तो मुझे बताया था वसंतलता
ऐसे ही प्रेमियों और प्रेमिकाओं के तन नष्ट हो जाते हैं
पर कहां छीजता है प्रेम?

काली बंगा से लौटते वक्त
तुम बीन लाईं कहीं से चूड़ी का वो टुकड़ा
और मुझसे पूछती रही,
क्या होता है टेराकोटा
और ये भी
पंद्रहवी सदी में किस कबीले की औरत ने पहनी होगी
टेराकोटा से बनी ये चूड़ी
मेरे पास नहीं है कोई जवाब
बस, तुम्हारी लाई चूड़ी का वो टुकड़ा रखा है मेरे पास
सदा रहेगा शायद
मैं नहीं जानता काली बंगा के बारे में
न ही उन औरतों के बारे में
बस पता है प्रेम
जो पता नहीं कहां,
पेट में, दिल में, मन में या फिर आंसुओं में
पीर पैदा करता है
यकीन मानो
वो नष्ट नहीं होता कभी....

प्रेम से सृष्टि का निर्माण हुआ,प्रेम के प्राकृत तत्व से कार्तिकेय का जन्म हुआ .... नष्ट होना प्रेम की परम्परा नहीं.

प्रेम नहीं है 99 साल की लीज 

मैं : प्रेम का क्या होगा, जब साथ नहीं रह पाएंगे
तू : चुप कर, चूम ले बस
मैं : पर कब तक
तू : एक ये पल जीवन से बड़ा नहीं है क्या?

या तो यक़ीन, या फिर...

मैं : आज फिर तू उससे मिली
तू : हां! तूने देखा!
हां : कोई बात नहीं, मुझे तुझ पर यक़ीन है
तू : यक़ीन? फिर सवाल कैसे जन्मा?

जीवन से अलग?

मैं : मेरे लिखे डायलॉग सब बोलेंगे
तू : और कहानी का क्या होगा?
मैं : कहानी से ही तो निकलेंगे...
तू : फिर अलग से क्यों लिखने पड़ेंगे?........

जब प्रेम शोखियों पर उतर आता है,तो पूरी कायनात शोख,चंचल हो जाती है - ऐसे में कुछ हटके लिखना कहाँ हो पाता है भला. कुछ यही स्थिति शुक्ल जी की है -
..............

क्या करूं? कुछ ठोस. देर तक असर करने वाला लिखा ही नहीं जा रहा बहुत दिन से...उश्च्छृंखलता स्वभाव और सृजन पर कितना गहरा असर डाल रही है...कहना मुश्किल है...ख़ैर...इस बीच कुछ-कुछ दो-चार पंक्तियों से ज्यादा नहीं लिख पाया...तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे मेरा...की तर्ज पर वही सबकुछ आपके लिए...

ये मुझे है पसंद
बचा इक इरादा है तो बस ये...तुम्हारी राह में हम फूल बनके बिछ जाएं.../ ये इंसान की सूरत भला लेके करेंगे क्या, भला हो काजल बनें और तुम्हारी आंख में रच जाएं...

एक और पसंदीदा पंक्ति
इक बात मेरी तीर सी उतर जाती है ज़िगर में... जान-ए-जां कभी प्यार का मुकम्मल फ़लसफ़ा भी याद करो / सुलगती रात के बाद सुबहा में उलझे गेसू याद करो / करो जो याद तो मेरी इरादा-ए-वफ़ा याद करो / राह-ए-मोहब्बत में कांटों की उलझनें भुला दो साथी / अब मौक़ा है जो हमारे प्यार की ज़ुबां याद करो

कभी गुजरते हुए उम्र के बागबां से....

कभी गुज़रते हुए उम्र के बागबां से, जो यादों का कोई दरख़्त टकरा जाए बांह से, तू रुकना, कुछ हंसना फिर छू लेना उसकी पत्तियां....तुझे कहां है पता, वो तो मैं ही हूं, जो उगा हूं तेरी राह में....यकीं रख, लम्हा भर की उस छुअन के लिए, मैं जीना चाहूंगा हज़ार सदियां...लेना चाहूंगा सौ-सौ जनम...आना...मेरे सुगना...आना.

नगमा और सपना
नींद भर सो लेने के बाद, जाग जाने से पहले मैंने देखा है कई बार सपना... तू गुनगुनाती रही, मैं सुनता रहा, देखते-देखते बन गया नगमा अपना....ज़िंदगी भर क्यों हम बेज़ार होते रहें, आ बढ़ें, संग चलें, देखते-देखते दुश्मन भी हो जाएगा...हां, अपना.

चेहरे-कपड़े-मुखौटे
तुम्हें चेहरे से क्या मतलब / तुम्हें कपड़ों से क्या मतलब / हमें मालूम है तुम्हारे लिए हैं ये सब बहाने भर.../ भला कहते रहो तुम औरतों को मूरख / हमें भी नज़र आता है तुम्हारी नज़र का मतलब....

सांस, दूध और पानी
पानी की बूंदों में घुला दूध का स्वाद, सांसों से फूटी इलायची जैसी ख़ुशबू...तू मिला साथी, गर्म हो गई अहसास की चाय..

इश्क..मर्ज...दवा
इश्क हो मर्ज, तो लब हैं दवा / ग़मों की क्या बिसात, न हो जाएं वो हवा! 

तुम्हीं कहो....
कभी कहते हो हमारी ज़िंदगी से रुखसत हो जाओ, कभी इकरार करते हो फर्ज-ए-मोहब्बत का...तुम्हीं में अक्स देखा है हमने सांसों की बुलंदी का, भला अख्तियार क्यों करते हो ये रास्ता अदावत का

बांकपन...
ये माना कि ख़फ़ा है तू, बिना मेरे तेरी रहगुज़र भी तो नहीं....ये ना सोचो कि ग़ुरूर में हूं मैं, मेरी जां तेरे साथ के बिन मेरा भी बसर तो नहीं...

जाम और नाम
हर सांस में तेरा नाम था, धड़कनों में सलाम था.../ जिस डगर पे तेरे पग चले, उसी राह पे पयाम था / हमें मयनशी की आदत कहां, तेरी आंख में ही जाम था / अब तू कहां और हम कहां पर इतनी तो है ज़िद बाकी बची / जब तक जिए, हम संग रहे, प्यार ही अपना काम था

अवधी में प्यार
वही ठइयां ठाड़े रहिबै बालम, जहवां तू हमइं छोड़ि गयेव है....मनवां मां उठत हइ हूक बहुत अब, सोचेव भी नाईं तू हमइं कहां छो़ड़ि गयेव है...देहियां के पीरा कइ नाहीं कउनउ इलाज भवा, करेजवा मां अगिया तू झोंकि गयेव है...अबहिंव तू फिकिर करौ, हमसे तू धाइ मिलव...अंखिया ना मूंदब, खाइब ना पीयब, नाहीं हम जीबै, नाहिन मरबै, वहीं ठइयां ठाड़े रहिबै बालम, जहवां तू हमइं छोड़ि गयेव है...

एक और अवधी रचना...ब-स्टाइल-लोकगीत
हमरे मन की चिरइया उड़ी जाय रे...फगुआ ना गावै, कजरी ना गावै, बहियां से छूटै हमैं तरसावै...यही ठइयां दगाबाज़ी किहां जाय रे...गोदिया बैठाइके भुइयां मां पटकै, मुहंवा लगाइके नैना झटके...नाहीं देखइ की जियरा झरसाइ रे...हमरे मन की चिरइया उड़ी जाय रे...

प्यार बुरा है?
माना ये संसार बुरा है...हम सबका व्यवहार बुरा है...धीरज धर के इतना सोचो...कहां हमारा प्यार बुरा है..

तुझे है वास्ता
तुझे हमसे प्यार का है वास्ता...न खुद से खुद की रक़ीब बन, जो खुद से मोहब्बत ना होगी आपको, तो कहां मिलेगा हमें भी रास्ता

जो अश्क कर पाते...
अश्क बयां कर पाते हाल-ए-दिल, तो चेहरे पे मिरे तेरी तस्वीर बनी होती / यूं न बह-बह के सूख जाने पर मज़बूर रहते, हाथों में मिलन की लकीर बनी होती

गुमां छोड़कर...
उजले जिस्म का ग़ुमां छोड़कर, स्याह आंख का अश्क बनना बेहतर....जो ज़ुदा हों, तो जाएं जान से...राह-ए-गलतफहमी पे भटकने से पेश्तर


ये भी है...अभी बाकी....

मुख़्तसर से तो मिले थे तुम, फौलाद-से जु़ड़ गए / चले थे मंदिर को जानम, क़दम तेरे दर को मुड़ गए

शेर---1
रहमत-ए-इश्क की बारिश जो कर जाओ तुम / यकीं मानों हमें हीरे भी खैरात लगने लगेंगे / और ये कहना ही क्या कि हम इश्क के ग़ुलाम हैं / तमाम सल्तनतों के ताज़ भी हमें आग लगने लगेंगे
शेर---2
सुलगती रही धूप, दिल से धुआं उठने लगा / दूरी ने यूं गाफ़िल किया-रस्ता ज़ुदा लगने लगा / यूं जाया न करो दूर तुम / हमारा आज देखो कल लगने लगा
शेर---3
बारिश हुई, नहाए रास्ते, ओस के संग मैं हूं... / बहुत झुलसा कई दिन तक, आज नशे में हूं.../ रफ़्ता-रफ़्ता दिल पे काबिज़ हुईं थी तनहाइयां / तुम मिलीं, खुशबू खिली और मैं मज़े में हूं..
शेर-4
तुम्हारी याद के नाते...तुम्हारे साथ के किस्से, न होते जो ये, तो हम भी कहां होते...
शेर-5
कहां से आते हैं उदासियों के हवाले, पता हमको नहीं सनम... इतना भर जान लो तुम, जो बिछड़े तो बाकी बचेगा ग़म
शेर-6
सोचते थे ज़ुदा होके भी जी लेंगे हम, आलम ये है कि सांसों में इक क़तरा हवा तक ना बची / जो बिछड़े दो घड़ी के लिए बस यूं ही बेसबब, ज़िंदगी के लिए देखो कोई आरज़ू ही ना बची
शेर-7
हम इतनी मुद्दत बाद मिले...फिर भी क्यों बने मन में गिले...हंसी की खनक से भर जाते सारे जख़्म...पर तू तो साथी अब तक होंठ सिले...
शेर-8
तुझे खुद से ज्यादा ही चाहा है हरदम...कैसे उपजे फिर भी बोलो मन में भरम
शेर-9
खूबसूरत हो तुम, तुम हो नादां बहुत / उड़ती रहो पर संभलकर उड़ो/ ज़िंदगी है कहां आसां बहुत ........... क्रमशः 

शनिवार, 29 सितंबर 2012

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजे ...9



प्यार ने इमरोज़ को बनाया या इमरोज़ ने प्यार को .... कैसे कहूँ,क्या कहूँ ! अमृता को इमरोज़ के प्यार ने आफ़ताब बनाया- जहाँ इमरोज़ खड़े हो जाएँ,अमृता मिल ही जाती है ! इमरोज़ से जो भी मिला,उसने प्यार के खुदा को पाया - इमरोज़ - एक तपस्वी,जिसने अपने इर्द गिर्द अदृश्य प्रेम की गुफा निर्मित की, गुफा के पोर पोर में अमृता के रंग भर दिए. इस चित्रकार की कूची अमृतामय रही,उन रंगों ने मेरी कलम को उकसाया .... तो एक प्यार की कहानी - मेरी कलम से ..


अमृता -
एक टीनएजर की आँखों में उतरी 
तो उतरती ही चली गई ...
वक़्त की नाजुकता 
रक्त के उबाल को 
किशोर ने समय दिया 
फिर क्या था 
समय अमृता को ले आया ....

अमृता के पास शब्द थे 
इमरोज़ के पास सुकून का जादू 
जिससे मिला उसे दिया 
निःसंदेह अमृता ख़ास थी 
तो उसके घर का कोना कोना 
महक उठा इस सुकून से ...

समाज ने उम्र के अंतराल को इन्गित किया 
खुद अमृता ने भी 
पर इमरोज़ ने हर तरफ रंग भर दिए 
दीवारों पर 
अमृता की हथेलियों पर 
आँखों में 
चेहरे पर 
रिश्ते दर रिश्तों पर 
यूँ कहें इश्क बनाम इमरोज़ 
अमृता के घर में जज़्ब हो गया ...

घर हौज़ ख़ास नहीं 
ग्रेटर कैलाश नहीं 
न दिल्ली, न मुंबई - कोई शहर नहीं 
घर - 
बस अमृता का वह पोस्टर 
जिससे इमरोज़ की चाहत जुड़ गई 
एक कमरे का वह मकान 
जहाँ अमृता जीने को आती रही
एक स्कूटर 
जिसकी रफ़्तार में 
अमृता इमरोज़ हो गई 
और अतीत - 
खुरचनों की तरह जमीन पर गिर गया !
बड़ी बात थी पर सहज था 
क्योंकि अतीत ने सिर्फ अमृता को देखा था 
इमरोज़ ने अमृता की आत्मा को 
....
यहाँ तो साथ चलते रिश्तों से नाम गुम हो जाते हैं 
पर इमरोज़ हर सुबह 
सूरज की पहली किरण से लेकर 
रात सोने तक 
एक ही नाम कहता है - अमृता !
इतनी शिद्दत से चाहा इमरोज़ ने 
कि शिद्दत भी खुद पे इतराती है 
समंदर सा इमरोज़ 
सीप सा इमरोज़ - अमृता को मोती बनना ही था !

प्यार की एक ख्वाहिश पारुल पुखराज के ख्यालों से उतरी ----- छुन छुन छनननन 

 पारुल "पुखराज - http://parulchaandpukhraajkaa.blogspot.in/

इसके पहले
कि खुश्क़ हो जाये ये दिन 
और ख़ामोश , दुबक कर सो जाए
रात की मसहरी में …
गुज़रना चाहती हूँ तुम्हारी जर्जर आवाज़ के गलियारे से
एक बार फिर …
वहां ,
उसकी गूँज के अंतिम छोर पर
टंगा होगा अब भी 
इक बड़ा, पुराना आला
जहां थक कर बैठ जाते थे हवा में पैर झुलाए 
हम दो 
चाहती हूँ सराबोर करना
दुपट्टे की कोर
तुम्हारी कासनी मुस्कुराहट के छींटो से,
टूटते जुमलों में पिरोना
ज़िद की लड़ियाँ…
स्मृतियों में ही सही
जिलाना चाहती हूँ अपने अंतस की
नन्ही बच्ची
जिसे चाव था धुँध का ,धनक का,
उजली सीपियों का …
जो लहरों की लय पर छेड़ती थी 
ऊँघती सारंगी की देह में
मल्हार…
जिसकी फुहारों में भीगता था
तुम्हारे काठ का अभिमान …
इसके पहले
कि दिन झपकने लगे अपनी अलस पलकें …
एक बार फिर
गुज़रना चाहती हूँ 
तुम्हारी अधूरी आवाज़ के गलियारे से
बस एक बार … 


प्रेम की अपनी अपनी परिभाषा है, क्योंकि प्रेम अनंत है,अविचल,अविरल है...ब्रह्मांड के हर अर्थ में है, हर कथा,हर वेश में है ....

अंजू अनन्या http://haripriya-radha-anju.blogspot.in/

प्रेम 
लेता है जन्म 
कारागृह में .....
विषमता के 
समंदर से 
गुजरता ...
खिलता है 
यमुना तट पे ...
धड़क उठता है,  
मधुबन, 
उसकी महक के 
स्पर्श से ......
और फिर 
गूंज उठता है 
अनूगूंज सा ....
मंदिर के 
अनहद 
नाद में .....

मेरी कलम,मेरा मन,मेरी रूह कहती है -


जो भी नाम दो...
प्यार  
इश्क
मुहब्बत 
ख़ुदा कहो या ईश्वर
शिव कहो या आदिशक्ति ........
एहसास तो है ही यह
रूह से इसे महसूस भी करते हैं
पर जिस तरह ईश्वर 
मंत्र की तरह 
दिल,ज़ुबान,मस्तिष्क से निरंतर प्रवाहित होता है...
प्यार को जितनी बार कहो-
कम लगता है 
जितनी बार सुनो
नशा होता है ...
प्यार एक आग है
जिसमें शब्दों का घृत आँखों से डालो 
या स्वाहा की तरह -प्यार है' कहो
यह बढ़ता है .....
शरीर आत्मा -
सबको अपनी आगोश में 
बिना हाथ बढ़ाये भर लेता है !

तर्क के छींटे 
प्यार में नहीं होते
हो ही नहीं सकते ...
सिर्फ एहसास नहीं है प्यार
पूरी सृष्टि समाहित है इसमें
जिसे देखा भी जाता है
छुआ भी जाता है
मनुहार,तकरार सब होता है प्यार ...

प्यार जताने से विश्वास की लौ बढ़ती है
खामोश विश्वास 
खुद आशंकित होता है 
ख़ामोशी लुप्त हो जाती है 
और आशंका ही एक दिन प्रस्फुटित होती है !
सिंचन न हो तो प्यार 
शुष्कता में शुन्यता से भर जाता है 
सच तो बस इतना है 
कि प्यार  सिर्फ एहसास ही नहीं
अभिव्यक्ति भी है ....                    

क्रमशः 

शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजे ...8



प्यार में शब्दों को कभी छूकर देखा है 
आँखों में काजल की तरह भरा है
भीड़ के भय में उसका संरक्षण महसूस किया है
उड़ते बादलों की धवलता में उसे पाया है
चिड़िया के बेफिक्र गान में सुना है 
ऊँचे टीले से उसकी पुकार सुनी है 
ख़ामोशी में उसे मुखर पाया है 
प्यार की कहानी में पात्रों की परिधि में 
खुद को देखा है ?????
देखा है
जाना है
पाया है - तो यकीन करो
यही प्यार है :)


इसी प्यार के खुमार में -


पता नहीं क्यूँ 
मन हो रहा है 
इस वक़्त 
एक सुलगी सी कविता लिखने का 
कुछ - कुछ मुझ जैसी
मेरे प्यार के जैसी .. १७ साला 
या एक coffee house में 
एक ग्लास पानी के जैसी
जो मेरे होठों से लग कर 
गुजरी थी .. तुमसे ही कहीं 
पता नहीं क्यूँ 
मन हो रहा है इस वक़्त 
एक नीले रंग की साड़ी पहनने का 
खारे पानी के जैसी .. नमकीन स्वाद वाली 
जिसे पहने देख कभी तुम्हारा दिल करा था 
मुझे गले लगाने का 
तब शायद तुम्हारे गर्दन पर ठहरे 
उस काले तिल को छू पाती मैं 
अपनी सुलगी सांसों से तुम्हें .. ख़त्म कर पाती मैं
जिंदा रहने की ख्वाइश तुममें .. कहीं जगा पाती मैं 

और खुद भी जी पाती 
उम्र भर के लिए 
बिना सुलगे ..
बिना बिखरे ..

मंजीत  ठाकुर  - http://gustakh.blogspot.in/

प्यार,
प्यार कोई पाखी तो नहीं,
कि तुमने गुलेल चलाया..
और फुर्र-से उड़ गया वो।

प्यार,
प्यार कोई रोटी तो नहीं,
तुमने पकाया-खाया,
और फट् से फना हो गया वो।

प्यार,
प्यार कोई शब्द तो नहीं,
तुमने पूछा, मैंने बताया
और शब्दकोष या स्क्रीन पर,
चस्पां हो गया वो।

प्यार,
प्यार तो कोई बीज है शायद,
उस पेड़ की, जिसकी जड़े बडी गहरी हैं,
हममें-तुममें जो नदी के वेग-सा समाया है,
हमारा-तुम्हारा असली सरमाया है।

कृष्ण बिहारी - http://swaarth.wordpress.com/2011/01/01/shashwatrahegapyar/

तुम्हे देखने के लिये 
कभी पीछे नहीं मुड़ा मैं
गुजरते वक्त्त के साथ-साथ
तुम चलती रही हो साथ ही मेरे
एक परछाई की तरह
सम – विषम राहों पर।

दूरियों का भी मुझे
कभी हुआ नहीं एहसास
ऎसा भी लगा नहीं कभी
कि तुम नहीं हो मेरे पास
तुम्हारी याद रह रही है
मेरे साथ
एक सघन विश्वास की तरह
आस्था बनकर।

तुम्हारे लिखे प्रेम-पत्रों को
इसलिये नहीं पढ़ता बार-बार
कि तुम्हारी याद को
रखना है ताजा
नहीं ऐसा नहीं है…
पत्र नहीं पढ़ता हूँ मैं
तुम्हे पढ़ता हूँ
एक महाकाव्य की तरह
जिज्ञासु होकर
और पाता रहता हूँ ब्रहमानंद।

अरसा गुजरने के बाद भी
भूल पाता है कोई
एक बार बस गई मेंहदी की गंध
अपनी आत्मा में रचाकर, बसाकर।

तुम मीरा हो, राधा हो
मेरे लिये
परकाया प्रवेश की तरह
उतरती हो तुम उनमें
और इच्छा धारियों की तरह
मेरा प्रेम
धरता रहा है रुप
ढ़ालता रहा है स्वयं को
तुम्हारे अनुरुप
होता रहा है युवा और नवीन
आने वाली पीढ़ियों के लिये
एक अमिट अनुभव की तरह
थाती बनाकर।

किसी को यकीन दिलाने का
कसमें खाने का
प्रश्न ही नहीं उठता
क्योंकि
मरकर भी प्रेम
कभी नहीं मरता
शाश्वत है
और शाश्वत रहेगा प्यार
धरती पर।

प्यार न मिटा है,न मिटेगा .......... क्रमशः 

बुधवार, 26 सितंबर 2012

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजे ...7



प्रेम से जब भी मुलाकात होती है
वह एक गीत बन हवाओं में बिखर जाता है कुछ यूँ -
बस एक क्लिक और कुहू गुप्ता की आवाज़ का जादू कहेगा 
'चलो तुमको लेकर चलें.....'

बोझिल आँखें,खुमार सी मुस्कुराहट और 

प्रियंकाभिलाषी - http://priyankaabhilaashi.blogspot.in/

तुम्हारा प्यार..
एकदम जिद्दी..
बिलकुल मुसलाधार बारिश जैसा..
कितना ही बचने की कोशिश करो..
रीत जाता है..
रूह की सतह तक..!!

ओम पुरोहित'कागद' - http://omkagad.blogspot.in/

एक लड़के से
एक लड़की मिली
दोनों में क्या बात हुई
इस पर
बातें घड़ी गई
बातें बनाई गई

बातें उड़ाई गई


बातें बिगाड़ी गई
बातें बिगड़ीं तो
बातें चलाई गई
बातें चल गईं तो
बात बिठाई गई
बात बैठ गई तो
बात बन गई 
बात बन गई तो
बात जमीं नहीं
बात जमी नहीं तो
बात समझाई गई 
बात मगर थमी नहीं
युग बीत गए
बात किस्सा बन गई
किस्से चल निकले तो
प्रेम कहानी कहलाए
फिर तो वही प्रेम 
उदाहरण बन गया
मंदिर-मज़ार भी बने
किस्से सुनाए जाने लगे
कहानी पढ़ी जाने लगी
उदाहरण दिए जाने लगे
शीश नवाए जाने लगे
चादरें चढ़ने लगीं
मेले सजने लगे 
प्रेम पर मगर
पाबंदी यथावत रही ।

आज भी 
प्रेम उचकता है
कान उठते हैं
जुबान चलती है
बातें निकलती हैं
प्रेम मगर थमता नहीं ।
प्रेम एक सफर है
बातों पर ही
हो कर सवार
शायद आया है प्रेम
इस सदी तक !


आरज़ू है,तमन्ना है,
ख्वाइश है, चाहत है,
तुझी से न जाने क्यों,
हमे इतनी मोहब्बत है।

सरोबार हर धड़कन मेरी
तेरे ही नाम से,
गहराई इस लगी की अब,
हर सांस तेरी इबादत है...

....................................................

प्यार ही जन्म है,प्यार मृत्यु,प्यार तर्पण,............प्यार के बगैर न सृष्टि,न आदिशक्ति ..... 
प्यार तर्क से परे है
वह प्रश्न है ही नहीं
वह एक निनाद है
जो निरंतर मुखरित है
बकवास करते हैं लोग
जो कहते है कि प्यार कहने की चीज नहीं...
प्यार कोई चीज नहीं
प्यार ॐ है
ॐ के बगैर जीवन नहीं
प्रेम के बगैर ॐ नहीं ......               क्रमशः 

सोमवार, 24 सितंबर 2012

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजे ...6




चाँद झील में उतर
नर्म दूबों पर चलने को आतुर है....
सितारे गलीचों की शक्ल ले
मचल रहे हैं....
ख़्वाबों के मेले ने
गुल खिलाये हैं
कोई गुनगुना रहा है.....................
सुना था,
अम्बर पे अनहोनी
नज़र आती है
आज देखा और
महसूस किया है...........
फूलों की बारिश में
अमृत भी छलका है,
ढोलक की थाप पर
मन ये धड़का है....
धरती का रोम-रोम
गोकुल बन बैठा है !..............

प्यार अमरनाथ,प्यार गोकुळ,प्यार मथुरा,प्यार चनाब,प्यार सरहदों के आर-पार..... 
कभी दर्द ये देता है,कभी ख़ुशी.......

आराधना'मुक्ति' - http://feministpoems.blogspot.in/

मेरी ज़िन्दगी में तुम्हारे आने से
कुछ बदल गया है
बदल गये हैं गीतों के मायने
वो मन की गहराइयों तक
उतरने लगे हैं
देने लगे हैं आवाज़
मेरी भावनाओं को
मानो मेरी ही बातें
कहने लगे हैं,
बदल गया है मौसम का अन्दाज़
वो बातें करता है मुझसे
चिड़ियों के चहकने से
बारिश के रिमझिम से
मेरे साथ हँसता-रोता है मौसम
पहले सा नहीं रहा,
बदल गयी मेरे पाँवों की थिरकन
मेरा बोलना, मेरा देखना
मैं खुद को ही अब
पहचान नहीं पाती
सब बदल गया है,
मेरी ज़िन्दगी में तुम्हारे आने से
कुछ नया हुआ है
पहले की तरह अब
नहीं लगता डर मुझे
पुरुषों पर
कुछ-कुछ विश्वास हो चला है.

अंजू चौधरी - http://apnokasath.blogspot.in/

प्यार .......ये वोह शब्द है जो अधूरा होते हुए भी अपने आप मे..पूर्ण है
प्रेम अजेर अमर है !गंगा जल समान ...प्रेम राधा है ..प्रेम मीरा है ....प्यार वोह प्याला है
जिस ने पिया ...बस उस का रसपान वही जाने !भीड़ मे प्यार है जिस के साथ वोह फिर भी अकेला है ...और अकलेपन में है साथी उसका प्यार...सच्चा प्यार उस मोती समान ॥जो सुच्चा है पवित्र है ..........प्यार को परिभाषित ना करो दोस्तों ......ये अपनेआप मे है पूर्ण ..........
...............................................................................................................................

आँखों के रस्ते से जो दिल में उतरे हो ,
वही बसेरा तुमने बना लिया ,
चाहू या ना चाहू मै ,
फिर भी मेरा साथ तू ने पा लिया है ,
ये प्रेम की डगर पर मुझे साथ ले कर ,
चले हो मेरे मन के मीत ,
चलना साथ..........
देखो कही ......
भटक ना जायू...अटक ना जायू ...खो ना जायू ,
इस दुनिया की भीड़ में ..
हे ! मेरे मीत ,प्रेम के गीत ,
दे कर अपनी आवाज़ ....
डालना मेरे पैरो में प्यार की बेडियाँ ,
मेरे चेतन तन और अव् चेतन मन में ,
तूने दिया तीन शब्द का गीत,
सत्यम,शिवम् ,सुन्दरम ...........
जिसने मुझे किया इस प्रेम मै पवित्र ......
प्रेम की परिभाषा में मेरा ,
तन तो राह साथ पर ,मन खोया हर बार !
थामना अब .......
क्यूंकि अब तो तन और मन की भाषा बदली सी है ,
इस जीवन को मान के नाटक ...
दिया है सोंप अब तुझे ,
चाहे कठपुतली बना नचा ले ,
या दे मुझे भी ,सबकी नज़रो मे सम्मान ...
ना दौलत का नशा ,ना है धन की है चाह मुझे
मिले जो तुझे से सच्चा प्यार ..
बस वही है मेरा अपना ........
बस वही है मेरा अपना ...............
आँखों के रस्ते से जो दिल में उतरे हो ,

मार्क राय - http://markrai.blogspot.in/

तुम जो कहो
उसे प्रकाशित कर दूँ
अपने सर्वस्व को
तुम पर न्योछावर कर दूँ
अपनी समस्त ऊर्जा को
विश्रित कर दूँ
तुम जो कहो
अपने स्पर्श से
तुझे उष्मित कर दूँ
तेरे दर्द को ओढ़कर
ख़ुद को
धन्य कर दूँ
तुम जो कहो
तुझ पर जीवन
अर्पण कर दूँ
तेरे चेहरे का गुलाल
और लाल कर दूँ
दमकते सूरज को
निहाल कर दूँ
तुम जो कहो
दिन हो या रात
धुप हो या छांव
तेरे कदमों में
सर रख दूँ
तुम जो कहो

डा. रमा द्विवेदी http://ramadwivedi.wordpress.com/

खुदा ने अगर दिल मिलाये न होते
तो तुम तुम न होते हम हम न होते|

न यह हिम पिघलता न नदियां ये बहती
न नदियां मचलती न सागर में मिलती।
सागर की बाहों में गर समाये न होते
तो तुम तुम न होते हम हम न होते |

न साग्र यह तपता न बादल ये बनते
न बादल पिघलते न जलकण बरसते
जलकण धरा मे गर समाये न होते
तो तुम तुम न होते हम हम न होते |

न रितुयें बदलती न ये फूल खिलते
न तितली बहकती naभौरे मचलते
अगर प्यार के ये झरोखे न होते
तो तुम तुम न होते हम हम न होते

खुदा ने अगर दिल मिलाये न होते
तो तुम तुम न होते हम हम न होते |


................ प्यार - एक ख़ामोशी है,सुनती है कहा करती है ....... कहती रहेगी,आप सुनिए .... 
कल भी
आज भी 
आज भी
कल भी...........क्रमशः 

रविवार, 23 सितंबर 2012

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजे ...5




कलकल की साज पर
नन्हीं बूंदों की बारिश
और तुम्हारी याद...........
बिल्कुल कॉफी-सी लगती है !
तेज हवाएं,
ठिठुरती शाम
और तुम्हारी याद........
बिल्कुल अंगीठी-सी लगती है !
रुई से उड़ते बर्फ,
बर्फ की चादर
और तुम्हारी याद..........
बिल्कुल जन्नत-सी लगती है !
कहो तो -
कौन हो तुम ???.................

कोई छुवन,कोई सिहरन,कोई धुन,कोई गीत,कोई आवाज़.............या है प्यार !साँसों की संजीवनी है प्यार - 
तभी कहती हैं ...

सरस्वती प्रसाद - http://kalpvriksha-amma.blogspot.in/

सुबह,दोपहर,शाम,
और रात के रंग में रंगी
-समय की चादर,
बिना रुके सरकती जा रही हैं.....
धडकनों के अहर्निश ताल पर,
किसी अज्ञात नशे में झूमती,
ज़िंदगी थिरकती जा रही हैं.....
आगे बढ़ो,
जी चाहे जिस रंग से,
चादर पर अपना नाम लिख दो ,
जीवन-पात्र में ,
प्राणों की बाती डालकर,
नेह से भर दो.......
लौ उकसाओ,
और रंगों की मूल पहचान सीख लो,
इसी ज्योति में वो सारी तस्वीरें,
कहीं-न-कहीं दिखेंगी-
जो तुम्हारे आस-पास हैं...
देर मत करना,
वरना चूक जाओगे...
समय का क्या हैं,
उसके चरण नहीं थमते,
भूले से भी किसी का
इंतज़ार नहीं करते...
जीने के लिए मेरे प्रियवर ,
मन को अनुराग रंग में रंग लो..............
यह मेरी सीख नहीं,
प्यार भरा उपहार हैं!

उपासना सियाग - http://usiag.blogspot.in/

कहते हैं कि जब कोई प्रेम
 में होता है तो 
उसे आसमान का रंग
 नीले से बैंगनी या गुलाबी 
नज़र आने लगता है ......
पर यह भी तो कहा जाता है 
के जब कोई प्रेम 
में होता है तो उसे कुछ भी 
नज़र नहीं आता ,
प्यार  अँधा होता है 
और  उसे अपने प्रिय के
 सिवाय कुछ भी तो दिखाई
 देता नहीं है
 तो फिर ये रंग ,कैसे भी हो
 क्या फर्क पड़ता है .........
वह तो बस अपनी आँखों में 
अपने प्रिय की छवि को बसाये 
पलके मूंदे रखता है ........
अँधा नहीं बनता वह,
 बस कहीं अपने प्रिय की छवि 
उसकी आँखों से दूर ना हो इसीलिए 
उन्हें मूंदे रखता है ........

 शांतनु सान्याल - http://sanyalsduniya2.blogspot.in/

उस सजल नयन के तीर बसे हैं कदाचित 
चमकीले बूंदों की बस्तियां, 
साँझ ढले 
ख़ुश्बुओं के जुगनू जैसे उड़ चले हों 
दूर अरण्य पथ में, 
अंत प्रहर के स्वप्न की तरह, 
बहुत ही नाज़ुक, 
कोई प्रणय गीत लिख गया 
शायद मन -
दर्पण में भोर से पहले, 
तभी खिल चले हैं भावना के कुसुम, 
सूर्य उगने से पहले, 
न जाने कौन छू सा गया 
लाजवंती के पल्लव,
कांपते अधर से गिर चले हैं शिशिर कण,
या उसने छुआ हैं अंतर्मन - -

 निधि टंडन - http://zindaginaamaa.blogspot.in/

खुद ब खुद आ जाता है
बिन बुलाए ...
बिन खटखटाए ..
बिन कहे ...
बिन सुने ...
आना ही धर्म है जिसका
छा जाना ही कर्म है जिसका

अजब बदतमीज़ होता है न प्यार .             

:) प्यार में क्या नहीं कह जाते हम , इस प्यार को मैं क्या नाम दूँ .......................... क्रमशः 

शनिवार, 22 सितंबर 2012

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजे ...4




बालू के घरौंदे ...
छप छप होती लहरें
किसी नन्हीं चिड़िया का इधर उधर देखना
चलते चलते हाथ पकड़ यूँ ही मुस्कुराना
अचानक बारिश की बूंदों से भीगना
तवे पर किसी के लिए रोटियाँ सिंकना .... प्यार होता तो यही है !
....
कहते हैं लोग ताजमहल है प्यार का प्रतीक !!!
एक अदभुत ईमारत है ज़रूर
अदभुत दृश्य .... पर प्यार !
.....
प्यार तो टूटी झोपडी में होता है
जब टपकती बूंदों के आगे कोई टूटा बर्तन रख देता है
नींद न खुले - इस एहसास के साथ ...
प्यार तो खट्टे टिकोलों में भी होता है
परछाइयों से खेलने में होता है
....
एक बात कहूँ -
प्यार भगवान् है
वह हर हाल में साथ होता है ...

तभी तो प्यार में डूबा अस्तित्व महान यज्ञ होता है,स्नेहिल घी से इसकी लपटें उद्दत होती हैं ... इन्हीं लपटों की बानगी है मेरी कलम में - 

-दिव्या शुक्ला http://divya-shukla.blogspot.in/

कभी किन्ही मधुर पलों में
तुमने मुझसे कहा
चंदन की गंध क्यूँ फूटती है
तुम्हारी चंदनवर्णी देह से
खिलखिला कर मै -----
जोर से हंस बैठी --और बोली
मुझे चंदन बहुत प्रिय है न
उसे आत्मसात कर लिया मैने
कुछ वैसे ही जैसे तुम्हे -एवं
तुम्हारे अस्तित्व को --भी
- जो -मुझमें ही विलीन है
और ये ही सत्य है ------
जिसे अंतस से चाहो
वह आत्मसात हो ही जाता है
सुषमा  'आहुति' - http://sushma-aahuti.blogspot.in/

मुझे नही पता की प्यार क्या होता है
प्यार को समझने के लिए कोई
 बहुत-बहुत बड़े-बड़े ग्रन्थ नही पढ़े मैंने 
प्यार को व्यक्त करने के लिए कोई
 बड़े-बड़े शब्द भी नही मिले मुझे
मुझे तो सिर्फ इतना पता है...
किसी का ख्याल चुपके से होटों पे मुस्कान ला देता है
कोई हवा का झोका छू कर गुजरता है
तो किसी के होने का एहसास दिला देता है
जिसके लिए सिर्फ हम दिल से सोचते है
 शायद ऐसा ही प्यार होता है.. !!!

अनुपमा पाठक - http://www.anusheel.in/

एक पावन 
एहसास से 
बंध कर 
जी लेते हैं! 
मिले 
जो भी गम 
सहर्ष 
पी लेते हैं! 
क्यूंकि- 
प्रेम 
देता है 
वो शक्ति 
जो- 
पर्वत सी 
पीर को.. 
रजकण 
बता देती है! 
जीवन की 
दुर्गम राहों को.. 
सुगम 
बना देती है! 

बस यह प्रेम 
अक्षुण्ण रहे 
प्रार्थना में 
कह लेते हैं! 
भावनाओं के 
गगन पर 
बादलों संग 
बह लेते हैं! 
क्यूंकि- 
प्रेम देता है 
वो निश्छल ऊँचाई 
जो- 
विस्तार को 
अपने आँचल का.. 
श्रृंगार 
बता देती है! 
जिस गुलशन में 
ठहर जाये 
सुख का संसार 
बसा देती है! 

रीना मौर्य - http://mauryareena.blogspot.in/

खुद में ढूंढ़ती हूँ तुम्हें......
तुम्हारी अदा को अपनी अदा बनाकर 
खुद में ढूंढ़ती हूँ तुम्हें........
तुम्हारी मुस्कान को अपने चेहरे पर सजाकर 
खुद में ढूंढ़ती हूँ तुम्हें.......
तुम्हारी जिम्मेदारियों को अपने कंधे पर उठाकर 
खुद में ढूंढ़ती हूँ तुम्हें.......
आईने के सामने घंटों खड़े रहकर 
अपने बालों को सवांरना
खुद को आईने में निहारना....
अब तो ये सब मैंने भी सिख लिया है
आसमानी रंग की शर्ट पहनकर 
आसमान को देखते रहना
जाने क्या सुकून मिलता था तुम्हें इसमे
पर अब देखो मै भी आसमानी रंग की साड़ी पहनकर 
घंटों आसमान को देखती हूँ 
 और खुद में ढूंढ़ती हूँ तुम्हें.....
तुम्हारी आदतों को अपना बनाकर 
तुम्हारी खुशबू को खुद में बसाकर 
ढूंढ़ती हूँ तुम्हें........
और अब लगता है मेरी तलाश पूरी भी हो गयी है
तभी तो ये आसमानी रंग 
ये खुशबू 
ये ज़िम्मेदारियाँ 
तुम्हारी मुस्कान
सब मुझे भी तो भाते है...
क्यूंकि तुम कहीं नहीं गए हो 
तुम मुझमे बसे हो......
मुझमे बसे हो सदा के लिये .....

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजे ...3



लिखी नहीं प्रेम कविता
भला लिखी कहाँ जाती है 
यह तो चाँदनी है 
जो चाँद के दिल से झरती है 
लहरें हैं
जो समंदर के दिल से निकलती है
है चातक की चाह
पपीहे की आह
कोयल की कूक
दूरी में हूक 
छत पर नंगे पाँव की दौड़
परदे के पीछे की धड्कनें...
नहीं लगती भूख
सूखता है गला
पर बुझती नहीं प्यास 
प्यास बढ़ती है इक झलक पाकर
रूठने की नजाकत है
सामने आकर...
नहीं खुलते होठ
प्यार बयां नहीं होता 
प्रेम कहकर भी 
इसका इज़हार नहीं होता 
प्रेम-एक अनकही छुवन है
जिसकी आगोश से कोई जुदा नहीं होता ...
.........................................................................
गौर फरमाइए  कतील शिफाई की इन लकीरों पर ...
अपने हाथों की लकीरों में बसा लो मुझको,
मैं हूँ तेरा तो नसीब अपना बना लो मुझको।
मुझसे तू पूछने आया है वफा के मायने,
यह तेरी सादादिली मार न डाले मुझको।
खुद को मैं कहीं बाँट न लूँ दामन – दामन,
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको।......

सादगी ही तो है सरस दरबारी के एहसास में - http://merehissekidhoop-saras.blogspot.in/

मैंने तो कभी प्रेम कविता लिखी ही नहीं !
आज तक जो भी लिखा -
तुम से ही जुड़ा था  -
उसमें विरह था ...दूरियां थीं...शिकायतें थीं..
इंतज़ार था ...यादें थीं..
लेकिन प्रेम  जैसा कुछ भी नहीं ....
हो सकता है वे जादुई शब्द
हमने एक दूसरे से कभी कहे ही नहीं-
लेकिन हर उस पल जब एक दूसरे की ज़रुरत थी ...
हम थे...
नींद  में अक्सर तुम्हारा हाथ खींचकर ...
सिरहाना बना  ..आश्वस्त  हो सोई  हूँ .....
तुम्हारे घर देर से पहुँचने पर बैचैनी ...
और पहुँचते ही महायुद्ध !
तुम्हारे कहे बगैर -
तुम्हारी चिंताएं टोह लेना-
और तुम्हारा उन्हें यथा संभव छिपाना
हर जन्म दिन पर रजनी गंधा और एक कार्ड ...
जानते हो उसके बगैर -
मेरा जन्म दिन अधूरा है
हम कभी हाथों में हाथले
चांदनी रातों में नहीं घूमे-
अलबत्ता दूर होने पर
खिड़की की झिरी से चाँद को निहारा ज़रूर है
यही सोचकर की तुम जहाँ भी हो ..
उसे देख मुझे याद कर रहे होगे....
यही तै किया था न -
बरसों पहले
जब महीनों दूर रहने के बाद -
कुछ पलों के लिए मिला करते थे
कितना समय गुज़र गया
लेकिन आदतें आज भी नहीं बदलीं
और इन्ही आदतों में
न जाने कब --
प्यार शुमार हो गया -
चुपके से ...
दबे पाँव.....


तुम्हारे लिए प्यार था
ज़मीं से फलक तक साथ चलने का वादा..
और मैं खेत की मेड़ों पर हाथ थामे चलने को
प्यार कहती रही....
तुम चाँद तारे तोड़ कर
दामन में टांकने की बात को प्यार कहते रहे...
मैं तारों भरे आसमां तले
बेवजह हँसने और बतियाने को
प्यार समझती रही..
तुम सारी दुनिया की सैर करवाने को
प्यार जताना कहते..
मेरे लिए तो पास के मंदिर तक जाकर
संग संग दिया जलाना प्यार था...
तुम्हें मोमबत्ती के रौशनी में
किसी आलीशान होटल में
लज़ीज़ खाना, प्यार लगता था...
मुझे रसोई में साथ बैठ,एक थाली से ,
एक दूजे को
निवाले खिलने में प्यार दिखा...

शहंशाही प्यार था तुम्हारा...
बेशक ताजमहल सा तोहफा देता...
मौत के बाद भी...

मगर मेरी चाहतें तो थी छोटी छोटी...
कच्ची-पक्की ..खट्टी मीठी...चटपटी...
ठीक ही कहते थे तुम...
शायद पागल थी मैं...

डॉ चेतन भंडारी - http://6tann.blogspot.in/

प्यार ...
क्या है यह ?
लफ्ज़ नही है सिर्फ़
जिसे बाँध लिया जाए
किसी सीमा में
और खत्म कर दिया जाए
उसकी अंतहीनता को

प्यार ....
वस्तु भी नही है कोई
यह तो है एक एहसास
एक आश्वासन
जो धीरे धीरे
दिल में उतरता
मुक्त गगन सा विचरता
शब्दों को कविता कर जाता है

प्यार .....
है नयनों में भरा सपना
जो कई अनुरागी रंगो से रंगा
चहकता है पक्षी सा
अंधेरों को उजाले से भरता
नदी सा कल कल करता
बूंद को सागर कर जाता है

प्यार .....
मिलता है सिर्फ़
दिल के उस स्पन्दन पर
जब सारा अस्तित्व मैं से तू हो कर
एक दूजे में खो जाता है
कंटीली राह पर चल कर भी
जीवन को फूलों सा मह्काता है !!...
...................................................................................................प्रेम का लक्ष्य प्रेम है
                                                                                          वह जब भी अपनी प्रत्यंचा खींचता है
                                                                                          दिशाएं पिघलकर नदी की तरह बहती हैं
                                                                                                     और बंजर धरती में
                                                                                                      हरियाली दिखती है ...  
क्रमशः 


गुरुवार, 20 सितंबर 2012

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजे ...2




प्रेम .....
गाहे-गाहे इसे पढ़ा कीजे  
दिल से बेहतर कोई किताब नहीं 
.....
कोई रंग भरो,इसकी आभा की महिमा न जाए बखानी !उपमा,उपमान,उपमेय .... बशीर बद्र की इस रचना में प्रेम के आगे भावनाओं की शोखी है-
ऐ हुस्न-ए-बे-परवाह तुझे शबनम कहूँ शोला कहूँ
फूलों में भी शोख़ी तो है किसको मगर तुझ-सा कहूँ

गेसू उड़े महकी फ़िज़ा जादू करें आँखे तेरी
सोया हुआ मंज़र[1] कहूँ या जागता सपना कहूँ

चंदा की तू है चांदनी लहरों की तू है रागिनी
जान-ए-तमन्ना मैं तुझे क्या- क्या कहूँ क्या न कहूँ...
कहने के क्रम में प्रेम का प्रेम स्वरुप सबके अपने अपने हैं -
ऋता शेखर मधु’ - http://madhurgunjan.blogspot.in/
 
प्रेम एक है कई रूप हैं
कहीं छांव, यह कहीं धूप है
कहीं ये भक्ति कहीं है शक्ति
कहीं विरक्ति तो कहीं आसक्ति|
चमक रही थी चपल दामिनी
अनवरत बारिशों की झड़ी थी
पुत्र-प्रेम में वासुदेव ने
यमुना में ज्यों पांव धरे थे
यमुना क्यों उपलाई थी
पग कान्हा के छूकर उसने
अपनी प्यास बुझाई थी|
वात्सल्य-प्रेम में कान्हा के
यशोदा भी हरषाई थी|
कौन सा था प्रीत कान्हा
कौन सा वह राग था
शायद मधुर सी रागिनी से
बह रहा अनुराग था
बेबस बनी थी राधा प्यारी
लोक-लाज भूली थी सारी|
भक्ति में डूबी थी मीरा
महलों की वह रानी थी
मन के ही एहसास थे उनके
बन गई कृष्ण-दीवानी थीं|
निष्ठुर बने थे मोहन प्यारे
वृंदावन को छोड़ चले
विकल गोपियाँ सुध-बुध खोईं
किस प्रेम में वे थीं रोई|
पितृ-प्रेम में रामचन्द्र ने
वनवास भी स्वीकार किया
परिणीता सीता का पति-प्रेम था
दुर्गम वन अंगीकार किया
भ्रातृ-प्रेम से लक्ष्मण न चूके
उर्मि को विरह का भार दिया|
देख पति की आसक्ति
हाड़ा-रानी विचलित हुई
देश-प्रेम की खातिर उसने
अपने सिर का उपहार दिया
मनु ने झाँसी के प्रेम में
वीरांगना-भेष धार लिया|
पेड़ों से चिपक बहुगुणा ने
वृक्ष-प्रेम का दिया परिचय
जीवों से प्रेम करने का
मनेका का था निश्चय|
संयुक्ता को ले गए स्वयंवर से
प्रेम में कई समर हुए
मन-मंदिर में बसा इक दूजे को
लाला-मजनू अमर हुए|
अमृता की कविता इमरोज
इमरोज के चित्र में अमृता
इस प्रेम का क्या नाम होगा?
नाम से परे
यह एक एहसास है
दूर रहकर भी लगे
वह हमारे पास है
रूह से महसूस करो
चल रही जब तक सांस है
प्रेम की पराकाष्ठा
बन जाता उच्छवास है
प्रेम की बातें मधुरतम
सिर्फ वो ही जानते
जो प्रेम से बढ़कर जगत में
और कुछ ना मानते|
सीमा सिंघल'सदा'- http://sadalikhna.blogspot.in/
प्रेम सदा ही मधुर होता है,
चाहे लिया जाये या दिया जाये
जहां भी होता है यह
वहां विश्‍वास स्‍वयं उपजता है
किसी के कहने या करने
की जरूरत ही नहीं पड़ती
इसके लिए
प्रेम निस्‍वार्थ भाव
कब ले आता है मन में
कब समर्पण जाग जाता है
कब आस्‍था
आत्‍मा में जागृत हो उठती है
और एक ऊर्जा का संचार करती है
तरंगित धमनियां स्‍नेहमय हो
हर आडम्‍बर से परे
सिर्फ स्‍नेह की छाया तले
अपने जीवन को सौंप
अनेकोनेक सोपान पार कर जाती है
बिना थकान का अनुभव किये
मन हर्षित होता है
जीवन में सिर्फ उल्‍लास होता है
रंजो-गम से दूर
उसे सिर्फ एक ही अक्‍स नजर आता है
स्‍नेह का जिसे जितना बांटो
उतना ही बढ़ता है
अमर बेल की तरह .....
जब काम मरता है तब
प्रेम जागृत होता है
जब लोभ मरता है तो
वैराग्‍य का जन्‍म होता है
जब क्रोध का नष्‍ट होता है
तो क्षमा अस्तित्‍व में आती है
और क्षमा के साथ हम
फिर स्‍नेह को समर्पित हो जाते हैं ....!!!

रचना श्रीवास्तवhttp://rachana-merikavitayen.blogspot.in/
जब सूरज
कोहरे की चादर ओढ़ सोया हो
शहर पूरा
मध्यम रौशनी में नहाया हो 
थाम मेरा हाथ तुम
नर्म ओस पे
हौले सी चलना
जीवन जब थमने लगे
मायूसी दमन फैलाने लगे
तुम पास बैठ
प्यार में डूबे शब्द फैलाना
नर्म ठंडी बूँदें जो बर्फ़ बने 
रूई-सी सफ़ेदी 
जब हर शय को ढके 
उनमें बनते क़दमों के निशान 
संग मेरे तुम 
दूर तक जाना 
चाय की गर्म प्याली संग 
पुराना एलबम देखना 
पलटना एक एक पेज 
कुछ यों
के यादों के परदे पे
एक तरंग-सी उठ जाए 
उस तरंग में 
तुम मेरे साथ डूबना...
अंजू शर्मा -www.kavitakosh.org/anjusharma
चलो मीत,
चलें दिन और रात की सरहद के पार,
जहाँ तुम रात को दिन कहो 
तो मैं मुस्कुरा दूं,
जहाँ सूरज से तुम्हारी दोस्ती 
बरक़रार रहे 
और चाँद से मेरी नाराज़गी
बदल जाये ओस की बूंदों में,
चलो मीत,
चलें उम्र की उस सीमा के परे
जहाँ दिन, महीने, साल 
वाष्पित हो बदल जाएँ
उड़ते हुए साइबेरियन पंछियों में
और लौट जाएँ सदा के लिए
अपने देश,
चलो मीत,
चलें भावनाओं के उस परबत पर
जहाँ हर बढ़ते कदम पर
पीछे छूट जाये मेरा ऐतराज़ और 
संकोच,
और जब प्रेम शिखर नज़र आने लगे
तो मैं कसके पकड़ लूं तुम्हारा हाथ
मेरे डगमगाते कदम सध जाएँ 
तुम्हारे सहारे पर,
चलो मीत,
कि बंधन अब सुख की परिधि
में बदल चुका है
और उम्मीद की बाहें हर क्षण
बढ़ रही है तुम्हारी ओर,
आओ समेट लें हर सीप को
कि आज सालों बाद स्वाति नक्षत्र 
आने को है,
चलो मीत,
कि मिट जाये फर्क 
मिलन और जुदाई का,
इंतजार के पन्नों पर बिखरी
प्रेम की स्याही सूखने से पहले,
बदल दे उसे मुलाकात की
तस्वीरों में,
चलो मीत,
हर गुजरते पल में
हलके हो जाते हैं समय के पाँव,
और लम्बे हो जाते हैं उसके पंख,
चलो मीत आज बांध लें समय को 
सदा के लिए,
अभी, इसी पल..............
आरक्त चेहरा,खोयी आँखें,बढ़ती धड्कनें,रूकती-चलती साँसें और एक नाम- प्यार का ....
क्रमशः 

बुधवार, 19 सितंबर 2012

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजे ...


प्रेम को जानने के लिए आसक्ति होनी चाहिए, जुनून होना चाहिए, उसमें डूबे रहना चाहिए . प्रेम और भगवान्‌ को एक ही तत्व माना जाता है ...
प्रेम कभी भी शरीर की अवधारणा में नहीं सिमट सकता ... प्रेम वह अनुभूति है जिसमें साथ का एहसास निरंतर होता है ! न उम्र न जाति न उंच नीच ... प्रेम हर बन्धनों से परे एक आत्मशक्ति है , जहाँ सबकुछ हो सकता है .
कुछ पुराने कुछ नए - प्रेम के हर ढंग नए -
कवि पन्त की प्रेम अभिव्यक्ति आँखों के आगे एक हरीतिमा का निर्माण करती है,जिसकी हर लताओं से अगर की शाब्दिक खुशबू एक आध्यात्मिक सौंदर्य स्थापित करती है -
बाँध दिए क्यूँ प्राण प्राणों से
तुमने चिर अनजान प्राणों से ..
गोपन रह न सकेगी
अब यह मर्म कथा
प्राणों की न रुकेगी
बढ़ती विरह व्यथा
विवश फूटते गान प्राणों से
बाँध दिए क्यूँ प्राण प्राणों से
तुमने चिर अनजान प्राणों से ..
यह विदेह प्राणों का बंधन
अंतर्ज्वाला में तपता तन
मुग्ध हृदय सौन्दर्य ज्योति को
दग्ध कामना करता अर्पण
नहीं चाहता जो कुछ भी आदान प्राणों से
बाँध दिए क्यूँ प्राण प्राणों से
तुमने चिर अनजान प्राणों से ..’

महादेवी और प्रेम -जब सूक्ष्म एकाकार हो अनुभूतियाँ तो फिर प्रेम का परिचय क्या -
तुम मुझमें प्रिय, फिर परिचय क्या!

तारक में छवि, प्राणों में स्मृति
पलकों में नीरव पद की गति
लघु उर में पुलकों की संस्कृति
भर लाई हूँ तेरी चंचल
और करूँ जग में संचय क्या?

तेरा मुख सहास अरूणोदय
परछाई रजनी विषादमय
वह जागृति वह नींद स्वप्नमय,
खेल खेल थक थक सोने दे
मैं समझूँगी सृष्टि प्रलय क्या?

तेरा अधर विचुंबित प्याला
तेरी ही विस्मत मिश्रित हाला
तेरा ही मानस मधुशाला
फिर पूछूँ क्या मेरे साकी
देते हो मधुमय विषमय क्या?

चित्रित तू मैं हूँ रेखा क्रम,
मधुर राग तू मैं स्वर संगम
तू असीम मैं सीमा का भ्रम
काया-छाया में रहस्यमय
प्रेयसी प्रियतम का अभिनय क्या?...

हरिवंशराय बच्चन और सामीप्य की अनकही भावनाएं -
रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।
फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में
और चारों ओर दुनिया सो रही थी
तारिकाएँ ही गगन की जानती हैं
जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी
मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे
अधजगा-सा और अधसोया हुआ सा
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।
एक बिजली छू गई सहसा जगा मैं
कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में
इस तरह करवट पड़ी थी तुम कि आँसू
बह रहे थे इस नयन से उस नयन में
मैं लगा दूँ आग इस संसार में है
प्यार जिसमें इस तरह असमर्थ कातर
जानती हो उस समय क्या कर गुज़रने
के लिए था कर दिया तैयार तुमने!
रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।
प्रात ही की ओर को है रात चलती
औ’ उजाले में अंधेरा डूब जाता
मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी
खूबियों के साथ परदे को उठाता
एक चेहरा-सा लगा तुमने लिया था
और मैंने था उतारा एक चेहरा
वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने पर
ग़ज़ब का था किया अधिकार तुमने।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।
और उतने फ़ासले पर आज तक सौ
यत्न करके भी न आये फिर कभी हम
फिर न आया वक्त वैसा फिर न मौका
उस तरह का फिर न लौटा चाँद निर्मम
और अपनी वेदना मैं क्या बताऊँ
क्या नहीं ये पंक्तियाँ खुद बोलती हैं--
बुझ नहीं पाया अभी तक उस समय जो
रख दिया था हाथ पर अंगार तुमने।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।....

प्यार युगों से प्रवाहित गंगा,गोमती,गोदावरी....काश्मीर से कन्याकुमारी तक सुवासित, त्रिवेणी में अदृश्य सरस्वती की अद्वैत आभा... जिसने प्रेम न जिया हो,उसका जिया अनजिया रह गया समझो !
प्रेम तो खुद में व्याख्यायित है,उसकी क्या व्याख्या...तो बस प्रेम के कुछ ख़ास अनमोल कैनवस आपके लिए, जिसके हर रंग पुख्ता हैं - तो रखिये शब्द शब्द सीढ़ियों पर नर्म आँखें और गाहे गाहे इसे पढ़ते जाइये,क्योंकि इससे बेहतर कोई किताब नहीं ............
रवीन्द्र प्रभात - http://www.blogger.com/profile/11471859655099784046

ख़्वाबों की ताबीर तुम्हारी आँखों में है,
शोख़ जवाँ काश्मीर तुम्हारी आँखों में है।

तुझमें है ताबीर मोहब्बत की भीतर तक,
शायर गालिब-मीर तुम्हारी आँखों में है।

सुबहे काशी का मंजर ओ' शाम अवध का,
क्या सुन्दर तस्वीर तुम्हारी आँखों में है।

छलकाए अंगूरी नेह लुटाए हौले से,
राँझा की ओ हीर तुम्हारी आंखों में है।

ताजमहल का अक्स नक्श एलोरा का,
प्यार की हर जागीर तुम्हारी आँखों में है।
भरी उमस में पिघल-पिघल के बरसे जो,
हिमाचल की पीर तुम्हारी आँखों में है।

बूँद-बूँद को तरस उठे जो देखे बरबस,
राजस्थानी नीर तुम्हारी आँखों में है।

गोरी गुज़रती गुड़िया शर्मीली-सी,
सागर-सी गम्भीर तुम्हारी आँखों में है।

चाँद सलोना देख-देख के सागर झूमे,
गोया की तासीर तुम्हारी आँखों में है।

कान्हा नाचे रास रचाए छलकाए,
रोली-रंग-अबीर तुम्हारी आँखों में है।

तिरुपती की पावन मूरत सूरत-सी,
दक्षिण की प्राचीर तुम्हारी आँखों में है।

तमिल की ख़ुशबू कन्नड़-तेलगू की चेरी,
झाँक रही तदबीर तुम्हारी आँखों में है ।

खजुराहो की मूरत जैसी रची-बसी हो,
छवि सुन्दर-गम्भीर तुम्हारी आँखों में है ।

गीत बिहारी गए, बजे संगीत रवीन्द्र,
भारत की तकदीर तुम्हारी आँखों में है। ...

रंजना भाटिया - http://ranjanabhatia.blogspot.in/
काश मैं होती धरती पर बस उतनी
जिसके उपर सिर्फ़ आकाश बन तुम ही चल पाते
या मैं होती किसी कपास के पौधे की डोडी
जिसके धागे का तुम कुर्ता बना अपने तन पर सजाते
या मैं होती दूर पर्वत पर बहती एक झरना
तुम राही बन वहाँ रुक के अपनी प्यास बुझाते
या मैं होती मस्त ब्यार का एक झोंका
जिसके चलते तुम अपने थके तन को सहलाते
या मैं होती दूर गगन में टिमटिम करता एक तारा
जिसकी दिशा ज्ञान से तुम अपनी मंजिल पा जाते
यूँ ही सज जाते मेरे सब सपने बन के हक़ीकत
यदि मेरी ज़िंदगी के हमसफ़र कही तुम बन जाते !!...

संगीता स्वरुप - http://geet7553.blogspot.in/

याद है तुम्हें ?
एक दिन
अचानक आ कर
खड़े हो गए थे
मेरे सामने तुम
और पूछा था तुमने
कि - तुम्हें
गुलमोहर के फूल
पसंद हैं ?
तुम्हारा प्रश्न सुन
मैं स्वयं
पूरी की पूरी
प्रश्नचिह्न बन गयी थी ।
न गुलाब , न कमल
न मोगरा , न रजनीगंधा ।
पूछा भी तो क्या
गुलमोहर?
आँखों में तैरते
मेरे प्रश्न को
शायद तुमने
पढ़ लिया था
और मेरा हाथ पकड़
लगभग खींचते हुए से
ले गए थे
निकट के पार्क में ।
जहाँ बहुत से
गुलमोहर के पेड़ थे।
पेड़ फूलों से लदे थे
और वो फूल
ऐसे लग रहे थे मानो
नवब्याहता के
दहकते रुखसार हों ।
तुमने मुझे
बिठा दिया था
एक बेंच पर
जिसके नीचे भी
गुलमोहर के फूल
ऐसे बिछे हुए थे
मानो कि सुर्ख गलीचा हो।
मेरी तरफ देख
तुमने पूछा था
कि
कभी गुलमोहर का फूल
खाया है ?
मैं एकदम से
अचकचा गयी थी
और तुमने
पढ़ ली थी
मेरे चेहरे की भाषा ।
तुमने उचक कर
तोड़ लिया था
एक फूल
और उसकी
एक पंखुरी तोड़
थमा दी थी मुझे ।
और बाकी का फूल
तुम खा गए थे कचा-कच ।
मुस्कुरा कर
कहा था तुमने
कि - खा कर देखो ।
ना जाने क्या था
तुम्हारी आँखों में
कि
मैंने रख ली थी
मुंह में वो पंखुरी।
आज भी जब
आती है
तुम्हारी याद
तो
जीव्हा पर आ जाता है
खट्टा - मीठा सा
गुलमोहर का स्वाद।



वंदना गुप्ता - http://vandana-zindagi.blogspot.in/

दौड़ती भागती रही उम्र भर
तेरे इश्क की कच्ची गलियों में
लगाती रही सेंध बंजारों की टोलियों में
होगा कहीं मेरा बंजारा भी
जिसकी सारंगी की धुन पर
इश्क की कशिश पर
नृत्य करने लगेंगी मेरी चूड़ियाँ
रेशम की ओढनी पर
लगी होंगी जंगली बेल बूँटियाँ
और बजती होंगी किसी
मंदिर की चौखट पर
इश्क की घंटियाँ
स्वप्न के पार होगी कहीं
कोई स्वप्निली घाटियाँ
जिसके एक छोर पर
सारंगी बजाता होगा मेरा बंजारा
और दूसरे छोर पर
कोई रक्कासा की परछाईं
करती होगी नृत्य सांझ की चौखट पर
एक धूमिल अक्स झुक रहा होगा आसमाँ का
करने कदमबोसी इश्क की ..........
सुनो ............आवाज़ पहुंची तुम तक ?
मेरे ख्वाबों की चखरी पर
हकीकत का मांजा क्यों नहीं चढ़ता ?
ये आखिरी ख़त की भाषा
कोई रंगरेज क्यों नहीं समझता ?
शायद अब इश्क की बारातें नहीं निकला करतीं
जनाजों की धूम खामोश होने लगी है
तभी तो देखो ना ..................
मैंने जो पकड़ी थी एक लकीर हाथों से
उसके बस निशाँ ही हथेली पर पसरे पड़े हैं
मगर कोई ज्योतिषी बूझ ही नहीं पा रहा
इश्क का ज्ञान .............
देखो ना मेरी हथेली पर
सारी रेखाएं मिट चुकी हैं
सिर्फ इश्क की रेखा ही कैसे टिमटिमा रही है
फिर भी नहीं कर पा रहा कोई भविष्यवाणी
अब ये भविष्य वक्ता का दोष है या इश्क की इन्तेहाँ
जो बस सिर्फ एक रेखा का गणित ही
सवाल हल नहीं कर पा रहा
और देखो तो ............सदियाँ बीत गयीं
सुलझाते सुलझाते धागे की उलझन को
बालों में उतरी चाँदी गवाह है इसकी
जितना सुलझाने की कोशिश करती हूँ
जितना मौलवी से कलमे पढवाती हूँ
ताबीज़ गढ़वाती हूँ
ये नामुराद इश्क की रेखा उतनी ही सुर्ख हो जाती है
ना ना .........इश्क की रेखा हर हथेली में नहीं होती
और जिसमे होती है तो वहाँ
बस सिर्फ एक वो ही रेखा होती है
और मेरी हथेली की जमीन देखो तो ज़रा
कितनी चमक रही है
बर्फ की चादर बिछी है
जिसकी मांग सिन्दूर से भरी है
अमिट है मेरा सुहाग ......जानते हो ना
तभी तो दिन पर दिन
सुहागरेखा कैसे गहरा रही है
इसीलिए अब बंद रखती हूँ मुट्ठी को
कहीं नज़र ना लग जाए
वैसे तुम्हारी नज़र का
इन्तखाब तो आज भी है
मगर इंतज़ार के पुलों पर
ख्वाबों के बाँध बांधे तो
युगों बीत गए .........
क्या पहुँचा तुम तक
इंतज़ार -ओ-इश्क का जूनून
जानती हूँ नहीं पहुँचा होगा
तभी तो लहू का रिसना जारी है
यूँ ही इश्क का सुहाग अमर नहीं होता
जब तक ना दर्द का लहू रिसता
और फिर बंजारों की टोलियाँ
वैसे भी कब महलों की मोहताज हुई हैं
इश्क की चादरें तो बिना धागों के बुनी जाती हैं
और मेरी हथेली के बीचो बीच खिंची रेखा तो
लक्ष्मण रेखा से भी गहरी है , अटल है , तटस्थ है
जो इश्क की सुकूनी हवाओं की मोहताज नहीं
ओ मेरे इश्क के बंजारे ...........तू जहाँ भी है
याद रखना ...........एक दिन इश्क के जनाजे में ताशे तू ही बजा रहा होगा
और मेरा इश्क गुनगुना रहा होगा
रब्बा इश्क के पाँव में मेहंदी लगा दे कोई
इक शब की दुल्हन बना दे कोई ............
फिर भी कहती हूँ
यूँ इश्क के पेंचोखम में उलझना ठीक नहीं होता ...............जान की कीमत पर
क्योंकि
इंसानियत की रूह जब उतरती है
तब इश्क की दुल्हन अक्स बदलती है ...........और आइनों पर लिबास नहीं होते
देख लेना आकर क़यामत के रोज़ मेरी हथेलियों की सुर्ख रंगत ..........
जो किसी मेहंदी की मोहताज नहीं
फिर चाहे तेरे इंतज़ार की ही क्यों ना हो ............
इश्क का पंचनामा ऐसे भी हुआ करता है …………ओ मेरे बंजारे !!!!!!!!

संध्या शर्मा - http://sandhyakavyadhara.blogspot.in/

तरंग सरिता की
हिलोरें लेने लगीं
नयनो में
बांध भावनाओं का
फूट पड़ा
शिथिल कर गईं
पलकों को
भावहीन हवाएं
अंतस अनंत गहरा
घोर अँधेरा
मौन हूँ मैं
और तुम....!
बह रहे हो
झर-झर
इन नयनो से
झरने की तरह
क्यों ना तुम
भींच लो मुट्ठी
निचोड़ दो बादलों को
भर दो प्रणय सरिता
और मैं....!
समेट लूँ तुमको
मूंदकर पलकें....

सोनल रस्तोगी - http://sonal-rastogi.blogspot.in/
एक बात कहूं गर करो यकीं
ऐसा पहले कुछ हुआ नहीं
जैसा पल पल अब होता है
जैसा हर पल अब होता है
मैं जगते जगते सोती हूँ
और सोते से जग जाती हूँ
रातों को करवट लेती हूँ
ना जाने क्यों मुस्काती हूँ
अन्जानी सी सिरहन कोई
भीतर से अक्सर उठती है
जो कह देते हो बात कोई
क्यों मेरी आँखे झुकती हैं
जादू तो तुमने किया नहीं
ख़ामोशी मैं सुन लेती हूँ
गुमसुम सी मैं हो जाती हूँ
लगता है कुछ पा जाती हूँ
खुद जाने क्यों खो जाती हूँ
पूछूं गर तो सच कहना
प्यार यही तो होता है :-)

उषा राय - http://ushadr.blogspot.in/
शंख हो तुम !
तुम्हारे भीतर विराजता है एक समुन्दर ,
चांदनी बगल में लेट जाती है ,
इन्द्रधनुष सी बिखरती है हँसी,
परत दर परत झिलमिलाता है उजाला ,
कोमल बिजली सा कौंधता है रूप ,
ये तुम हो !
पूरी की पूरी शंख जैसी !!!...................

प्यार की चाँदनी कहो या चाशनी या चाँदनी में गिरती ओस की बूंदें- कहो या जियो...प्यार तो बस प्यार है
क्रमशः ...