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गुरुवार, 18 अक्तूबर 2012

हम लड़ते क्यूँ हैं ?


हम लड़ते क्यूँ हैं ? ' देश के लिए लड़ना , स्वत्व के लिए लड़ना - समझ में आता है . पर जहाँ ऐसा कुछ भी नहीं , वहाँ हम थोड़ी सी जगह बनाकर खड़े हो जाते हैं 
और कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा लेकर लड़ने लगते हैं - क्यूँ ? कोई समस्या हो तो भी समझा जा सकता है , पर सम्मान खोकर समस्या उठाना , बिना किसी प्रयोजन 
के - लड़ाकू मानसिकता को दर्शाता है . जब कोई अच्छी बात होती है तो वहाँ कम लोग नज़र आते हैं , पर यदि लाठी चल रही हो तो सब अपनी लाठी लेकर दौड़ जाते 
हैं ! यदि सर किसी और का है तो चलता है,अपना हो तो फिर ...... !!!
अच्छा लिखिए अच्छा पढ़िए अच्छा सोचिये ....... यूँ ही तीर मत चलाइये हवा में . श्रवण को लग गया तो उसके माता-पिता का श्राप भोगना होगा . इसलिए आराम से 
अच्छी बातों पर मनन करें, कभी खुराफात करने का दिल कर ही जाये तो रुमाल चोर खेलिए :)

छुईमुई से ख्याल - 

तुम हाँ तुम ....: इंतज़ार है !!!!


होगा ये भी,
जब लुढ़काओगी चावल से भरा हुआ वो कलश अपने पैरों से ,
ये घर तुम्हारी बासमती से महक उठेगा !!!!

सोंधी खुशबू से ख्याल -

पानी के एक घूँट से बेताबी और बढ़ी
मेरे गाँव की नदी क्या तेरे शहर से बह आयी है ?

ज़िन्दगी ख्यालों की पांडुलिपि है -

ज़िंदगी ~~ फूलों की ज़ंजीर - बूँद..बूँद...लम्हे....



बाँधे फूल से कोमल रिश्ते ~
बेताब मन को...
महकाते, बहलाते..,
बहकाते...उलझाते..!

कितने रहस्य हैं ख्यालों के -

देखो नज़र के उस पार
बहुत कुछ है
खुरदुरे कम्बलों में लिपटी जाड़ों की रातें
धूल धुसरित बकरियों के झुण्ड
स्कूल के पीछे वाला क्रिकेट ग्राउंड
शाम के रंग में घुली पंछियों की हंसी ठिठोली
भूरी पहाड़ी की गुफा में सुस्ताते शंकरजी
बिस्तर के नीचे रखा यादों का बक्सा
जर्जर सहमे से घर
और कुछ गूंगी आँखें
सब उसी पगडण्डी को तकते हैं
जिसपर दौड़कर तुमने उड़ान भरी थी.

बिना यादों के न सपने न ख्याल -

सपनों के ताने बाने और 
यादों के कुछ टांके 
जीवन भर में क्या क्या पाया 
मोल इन्हीं से आंकें ...

जीवन में क्या खोया क्या पाया ... क्यूँ खोया क्यूँ पाया .... आकलन कीजिये ,ज़रूरी है - 

12 टिप्‍पणियां:

  1. बिना यादों के न सपने न ख्याल ... जरूरी है बस इक यही सवाल ...
    सादर

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  2. सभी रचनाएँ बहुत सुंदर हैं! मेरी रचना को इसमें स्थान देने के लिए धन्यवाद व आभार..!
    ~सादर !

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  3. दी क्या बात कही आपने...
    यूँ ही तीर मत चलाइये हवा में . श्रवण को लग गया तो उसके माता-पिता का श्राप भोगना होगा ....काश के सब थोड़ा सा सोचकर कहते या करते...दुनिया के गम आधे होते शायद..

    इतने प्यारे लिंक्स के बीच अपनी रचना का लिंक्स बड़ी खुशी दे रहा है...
    :-)
    आपका आभार...
    सादर
    अनु

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  4. बहुत शुक्रिया रश्मि जी ....
    मुझे अनु और देवांशु के लिंक्स बहुत अच्छे लगे ....शेष भी बेहतर हैं ....इस बेहतरीन पोस्ट में शामिल करने का शुक्रिया

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  5. larna mansikta...larta to hai hi jeev (creature)....kisi dar se....dar achha hai...jeena sikhata hai...urna chahiye... nahin to girogo kaise aur gir ke nahin uthe to jiyoge kaise....pyar kar ..pyar kar.. pyar kar...aur jinda rah..markar nahin jee kar jinda rah......lar mat...ghar chal...pani pi...age barh...jee le....chahe thori pee le.....pee kar hi jee le....ik din bik jayega mati ke mole....lar mat...... ghar chal....

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  6. मेरी रचना संकलित करने के लिए हार्दिक धन्यवाद दीदी. सभी रचनायें मनभावन हैं.

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