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बुधवार, 3 अक्तूबर 2012

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजे ...12




प्यार की जब बात हो,प्यार के पन्ने पलटे जाएँ तो अपनी पसंद के पन्नों के साथ कोई पास आ खड़ा होता है, आज के पन्ने लेकर हमारे साथ हैं वाणी शर्मा - http://vanigyan.blogspot.in/


अली सैयद - http://ummaten.blogspot.in/


उसने कहा ध्यान करो , उस ईश्वर का जो सृष्टि का रचयिता है  , जिसके कोई माता पिता नहीं और  जो अजन्मा है  , अनादि और  अनन्त है , सारे  ब्रम्हांड  उसमें  हैं  , जीवन और मृत्यु ...पुनर्जन्म और मोक्ष  जिसके इशारों पर तिरते हैं  ! मैंने कहा...मेरे ध्यान में केवल तुम हो  !

उसने कहा...मैं तो नश्वर हूं  , तुम ध्यान करो उस ईश्वर का जो  शाश्वत है , सनातन और चिर नवीन , अदभुत , अप्रतिम सौन्दर्य और भयंकर असौन्दर्य का स्वामी है जो  ! वही जिसकी करुणा और क्रोध का कोई छोर नहीं , तुम्हें  केवल उसे ही साधना है  !  मैं कहता हूं ...मैं  बस तुम्हें ही साधना चाहता हूं  ! 

नहीं मुझे क्यों  ?  तुच्छ अंश को छोड़ कर  तुम ध्यान करो उस परम अंश का , जो हम सबमें है और एक दिन हम सब को उसमें ही विलीन हो जाना है  ! सारी प्रकृति , सारे रंग , सुबह की ओस , दोपहर की सारी ऊष्मा और  रात्रि की नीरवता उसकी ही है  ! सुर ताल और नृत्य उससे ही हैं  !  गेय सब उसका और अगेय भी  ! ध्वनियां और जो ध्वनियां नहीं भी हैं  वे सब उसके कारण से अस्तित्व में है  !  मैं कहता हूं ...मेरे लिए इन सब का कोई मोल नहीं जो तुम ना होओ तो  ! 

उसने कहा तुम भटक रहे हो , सत्य के मार्ग से , ईश्वर सत्य है और मुक्तिदाता भी , हमें माया से मुक्त होना है और भौतिक जगत के उस पार की अलौकिकता के लिए तैयार भी होना है  ! अपने सारे भ्रमों को त्यागो और ध्यान करो उस ईश्वर का जो इहलौकिक जागतिक असत्य  से  इतर  परम सत्य है  !  सारे सुख और दुखों का चक्रव्यूह उसने ही रचा है  !  सारे रस ,  विषाद और आल्हाद उसने ही गूंथे हैं हमारे संबंधों के छल में   !  सो ध्यान करो  !  मैं कहता हूं... मुझे छला जाना प्रिय है  अगर उसमें तुम्हारा अहसास  भी हो  तो  !

तुम समझ नहीं रहे हो , हर यात्री को गंतव्य की सोचना चाहिये !  भटकाव का कोई अंत नहीं यदि तुम ना चाहोगे तो ! इसलिये ध्यान करो  !  ईश्वर गंतव्य है  !  मैं कहता हूं  ...नहीं ये ध्यान मुझसे ना होगा क्योंकि मेरी भटकन तुमसे है और मेरा गंतव्य भी तुम ही हो   ! 

उसने कहा...बहुत हुआ अब तुम शांत होकर अपनी आंखें बंद करो और ईश्वर का ध्यान करो  !  मैंने कहा छोडो भी ...मैं समझ गया कि तुम चाहती हो कि मैं तुम्हें ना देखूं ...तो फिर यह जान लो कि आंखें बंद करके भी मैं केवल तुम्हें ही देख पाता हूं  ! 

ईश्वर...उसे कभी देखा ही नहीं पर तुम...हर क्षण मेरे ठीक सामने का सत्य हो इसलिये मेरा सारा प्रेम और जितनी भी श्रद्धा मेरे अंदर बसती हो यहां तक कि थोड़ी बहुत घृणा भी यदि शेष रह गई हो मेरे मन के किसी कोने में ! यह सब केवल तुम्हारा है ...

-समीर लाल ’समीर’- http://udantashtari.blogspot.in/

वो दूर से भागता हुआ आया था इतनी सुबह...शायर की भाषा में अल सुबह और गर मैं कहूँ तो कहूँगा सुबह तो इसे क्या..क्यूँकि अभी तो रात की गिरी ओस मिली भी नहीं थी उस उगने को तैयार होते सूरज की किरणों से...विलिन हो जाने को उसके भीतर- खो देने को अपना अस्तित्व उसकी विराटता में समाहित हो कर खुशी खुशी. 

देखा था मैने कि वो हांफ रहा था मगर कोशिश थी कि सामान्य नज़र आये और कोई सुन भी न पाये उसकी हंफाई.... दिखी थी मुझे ....उसकी दोनों मुठ्ठियाँ भिंची हुई थी और चेहरे पर एक विजयी मुस्कान......एक दिव्य मुस्कान सी शायद अगर मेरी सोच के परे किसी भी और परिपेक्ष्य में उसे लिया जाये तो...मगर मुझे वो उसकी वो मुस्कान एक झेंपी सी मुस्कान लगी.. जब मैने उससे कहा कि क्या ले आये हो इस मुठ्ठी में बंद कर के ..जरा मुट्ठी तो खोलो...अभी तो सूरज भी आँख ही मल रहा है और तुम भागते हुए इतनी दूर से जाने क्या बंद कर लाये हो इन छोटी सी मुट्ठियों में...मुझे मालूम है कि कुछ अनजगे सपने होंगे सुबह जागने को आतुर-इस सोच के साथ कि शायद सच हो जायें.,..दिखाओ न...हम भी तो देखें...

खोल दो न अपनी मुट्ठी......

वो फिर झेंपा और धीरे से...कुछ सकुचाते हुए...कुछ शरमाते हुए..आखिर खोल ही दिये अपनी दोनों मुठ्ठियाँ में भरे वो अनजगे सपने… मेरे सामने...और वो सपने आँख मलते अकबका कर जागे.. मुझे दिखा कुछ खून......सूर्ख लाल खून.. उसकी कोमल हथेलियों से रिसता हुआ और छोटे छोटे ढेर सारे काँटे गुलाब के..छितराये हुए उन नाजुक हथेलियों पर..कुछ चुभे हुए तो कुछ बिखरे बिखरे हुए से....न चुभ पाने से उदास...मायूस...

-अरे, ये क्या?- इन्हें क्यूँ ले आये हो मेरे पास? मुझे तो गुलाब पसंद हैं और तुम ..ये काँटे  .. ये कैसा मजाक है? मैं भला इन काँटों का क्या करुँगी? और ये खून?...तुम जानते हो न...मुझे खून देखना पसंद नहीं है..खून देखना मुझे बर्दाश्त नहीं होता...लहु का वो लाल रंग...एक बेहोशॊ सी छा जाती है मुझ पर..

यह लाल रंग..याद दिलाता है मुझे उस सिंदूर की...जो पोंछा गया था बिना उसकी किसी गल्ती के...उसके आदमी के अतिशय शराब पीकर लीवर से दुश्मनी भजा लेने की एवज में...उस जलती चिता के सामने...समाज से डायन का दर्जा प्राप्त करते..समाज की नजर में जो निगल गई थी अपने पति को.....बस!! एक पुरुष प्रधान समाज...यूँ लांछित करता है अबला को..उफ्फ!

तुम कहते कि मुझे पता है कि खून तुमसे बर्दाश्त नहीं होता मगर तुम्हारी पसंद वो सुर्ख लाल गुलाब है. मै नहीं चाहता कि तुम्हें वो जरा भी बासी मिले तो चलो मेरे साथ अब और तोड़ लो ताज़ा ताज़ा उस गुलाब को ..एकदम उसकी लाल सुर्खियत के साथ...बिना कोई रंगत खोये...

बस, इस कोशिश में तुम्हे कोई काँटा न चुभे  .तुम्हारी ऊँगली से खून न बहे..वरना कैसे बर्दाश्त कर पाओगी तुम...और तुम कर भी लो तो मैं..

बस यही एक कोशिश रही है मेरी..कि... मेरा खून जो रिसा है हथेली से मेरी...वो रखेगा उस गुलाब का रंग..सुर्ख लाल...जो पसंद है तुम्हें..ओ मेरी पाकीज़ा गज़ल!!

बस. मत देख इस खून को जो रिसा है मेरी हथेली से लाल रंग का.....और बरकरार रख मुझसे विश्वास का वो रिश्ता ..जिसे लेकर हम साथ चले थे उस रोज...और जिसे सीने से लगाये ही हम बिछड़े थे उस रोज...

याद है न वो दोनों दिन...तारीखें क्या थी वो दोनों.....चलो!!! तुम बताओ!!
 
है यार मेरा अपना शाईर जो मेरे दिल के अंदर रहता है
तड़प के वो है पूछ रहा, तू आखिर जिन्दा कैसे रहता है

हिमांशु - http://ramyantar.blogspot.in/

साढ़े छः बजे हैं अभी । नींद खुल गयी है पूरी तरह । पास की बन्द खिड़की की दरारों से गुजरी हवा सिहरा रही है मुझे । ओढ़ना-बिछौना छोड़ चादर ले बाहर निकलता हूँ । देखता हूँ आकाश किसी बालिका के स्मित मधुर हास की मीठी किरणों से उजास पा गया है । सोचता हूँ, कौन मुस्करा रहा है अभी ! शशक-सा ठिठकता हूँ, निरखता हूँ, फिर चलने लगता हूँ । मन में एक उपस्थिति की प्रतीति निरन्तर कर रहा हूँ । ठिठक-ठिठक-सा जा रहा हूँ - कौन खड़ा है सामने ? जल की सरसिज कलिका-सी अँगड़ाई लेती कौन खड़ी है वहाँ ! मन के सरोवर की मरालिनी-सी कौन है वहाँ ! मैं उत्कंठित हूँ , चेतना अ-निरुद्ध सोच रही है । पूछना चाह रहा हूँ, ’धुंध के भीतर छिपी तुम कौन हो ?’ कौन हो तुम आँसुओं की भाषा की तरह मूक ! 

आगे बढ़ता हूँ, निपट रही है धुंध । थोड़ी उजास दिखती है-बाहर भी, भीतर भी । चिन्तन चल रहा है, कौन है वह ! क्या उषा के अरुणिम गवाक्ष से झाँकता सविता है या आलिंगन में समा जाने की व्याकुलता सँजोती बाहों की तन्मय कविता है वह ! कौन है वह ? नेत्रों का आभास पा रहा हूँ - मधु प्याले ढरक रहे हैं । कौन खड़ा है वहाँ ? कल्पना के अनगिन रूप बन-सज रहे हैं । सजग देख रहा हूँ, नवल नील परिधान युक्त आकृति । मुग्ध हो रहा हूँ । निहार रहा हूँ वह अकृत्रिम रूप । अभी प्रारम्भ ही हुए आषाढ़ की सजल घटा-सी श्यामल लटें बिखराये, फेन की तरह उजले दाँतों में चंचल छिटक रहा अंचल-कोर दबाये, अपने चपल हाथों से बार-बार खिसकते अरुण-दुशाले को सम्हालते कोई खड़ा है वहाँ ! अरुणाभ अधर और चन्द्र की विमल विभा से भी छाला पड़ जाने वाली कोमल तन वाली वह कौन खड़ी है वहाँ ! कैसे बखानूँ वह अप्रतिम रूप ? झुकी हुई आँखें हैं, उज्ज्वल तन, जैसे पूर्णिमा की रात ही मुदिता होकर सामने आ खड़ी है । आँकने के बाहर है यह सौन्दर्य । 

मन चहक-चषक में भर लेना चाहता है वह मधु-रूप । चितवन आकर ठहर गयी है भीतर । फिर-फिर निहारता हूँ । कहीं यह मेरे मन के कुसुमित कानन की तरुणी अभिलाषा तो नहीं । कहीं यह मेरी छुपी हुई प्यास, मुझ व्यथित-तृषित चातक की स्वाति-सलिल पिपासा तो नहीं । क्यों बावला हो रहा हूँ मैं ! मैं भ्रमित मतवाला वसंत क्यों हो रहा हूँ ? कौन है, कौन है वहाँ ? 

मैं अभागा, दुबका रह जाता था निद्रा-गलियारों में । आज बाहर आया हूँ, तो दिख रहा है यह अनुपम सौन्दर्य । तुम जो भी हो खड़ी, यूँ ही बाँटती रहो अपनी मदिर चितवन । चाह नहीं कि मुझे अंक भरो, सुमन माल पहनाओ, जलद-दामिनी-सी गले लगो । बस ऐसे ही खड़ी रहो अपने पूरेपन के साथ, सम्पूर्ण सौन्दर्य-विस्तार समेटे । मन संतुष्ट है । प्रश्न भी कहीं पिछलग्गू हो गया है तुम्हारे सौन्दर्य-सम्मुख - कौन हो तुम? 

यूँ ही खड़ा रह गया हूँ देर तक । नहीं जानता कौन है वहाँ, पर लगता है शिशिर ही रूप धर आ खड़ी है । दुर्निवार है तुम्हारा सम्मोहन शिशिर-बाला ! 

6 टिप्‍पणियां:

  1. मित्रों के लिंक्स पढ़कर आनंद की अनुभूति हुई ! हैरत में हूं जो आपने मेरे पसंदीदा आलेख को चुना ! हृदय से कृतज्ञता ज्ञापित करता हूं !

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  2. गाहे बगाहे काहे नित पढ़ा किजिये...:)

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  3. अच्छे लिंक्स के आपके संकलन में सहयोग भर था , मेरे नाम की जरुरत कहाँ थी !! :)

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  4. बेहतरीन लेखनी के तीन उदाहरण...

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  5. बहुत संजो कर रखी अनुभूतियां थी, जो व्यक्त हुई थीं इस पोस्ट में...जिसे आपने यहां सजा दिया! आभार।

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  6. ईश्वर...उसे कभी देखा ही नहीं पर तुम...हर क्षण मेरे ठीक सामने का सत्य हो इसलिये मेरा सारा प्रेम और जितनी भी श्रद्धा मेरे अंदर बसती हो यहां तक कि थोड़ी बहुत घृणा भी यदि शेष रह गई हो मेरे मन के किसी कोने में ! यह सब केवल तुम्हारा है ...
    आपका चयन किया गया हर लिंक बहुत ही अच्‍छा है ... आभार इस प्रस्‍तुति के लिए

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