समर्थक

रविवार, 7 अक्तूबर 2012

आत्मा के इंधन से बने शाब्दिक भोजन



मैं और तुम 
और यह प्रकृति ....
कितना सौंदर्य,कितने रहस्य,कितने प्राप्य,
धरती अपनी
आकाश अपना
पाताल का भी ज्ञान
तारों से गुफ्तगू
आवश्यकताओं का अकूत भण्डार है इसमें
तो भावनाओं की अप्रतिम लहरें भी  ... 
...स्रोत ? .............. कभी वृक्ष,कभी नीड़,कभी ओस,कभी पहाड़,कभी कुम्हार,कभी ख़ामोशी....
स्रोत ही स्रोत हैं प्रेम,नफरत,क्रांति .... के 
इन्हीं स्रोतों के आगे ठिठकते हैं एहसास,
कोई कवि,कोई कहानीकार,कोई गीतकार,कोई मूर्तिकार,कोई चित्रकार.....बनता है 
सफल हुए तो आजीविका बन जाती है
नहीं हुए तो भी
आत्मा की भूख मिटती है ! 
:) तो चलिए मैं परोसती हूँ आत्मा के इंधन से बने शाब्दिक भोजन,
लम्हों की भूख मिटेगी - सच्ची ..................


अरविन्द जांगिड  - http://arvindjangid.blogspot.in/

जब कभी मन नहीं लगता,
तो मैं बाहर निकल पड़ता हूँ,
मगर सच कहूँ तो,
एक अजीब से फासले के साथ,
ये मैंने नहीं बनाया,
तो फिर किसने बनाया, 
मुझे कुछ पता नहीं,
हाँ, मगर कोई बात तो है,
जब भी मैं बोलता हूँ,
कुछ डरा सा रहता हूँ,
हाँ, ज्यादातर चुप ही रहता हूँ,
इसमे मेरी कोई गलती नहीं,
लोग सोच कर बोलते हैं,
समझ कर बोलते हैं,
और 'तौल' कर बोलते हैं,
उनके पास तराजू हैं,
हर बात का अलग,
कई तराजू हैं उनके पास,
मगर मेरे पास एक भी नहीं,
एक बार मैं उस तराजू को घर लाया था,
मगर जब भी मैंने तराजू की बाते मानी,
लगा जैसे अंदर कुछ टूट रहा हो,
बरसों का साथी कोई छूट रहा हो,
फिर मैंने उस तराजू को खुद ही तोड़ डाला,
उन लोगों से मिलकर कुछ खुशी होती है,
जिनके पास कोई तराजू नहीं,
सच मैं खुशी होती है.....,
यूँ तो शहर में कई तराजू बिकते हैं,
सबका अपना अपना,
मगर कोई 'सबका' नहीं,
कही ऐसा तराजू जो हो 'सबका',
अब तो बस उसे ही ढूंढता रहता हूँ,
'सच' तो ये है की वो लोग,
जो तराजू वाले हैं,
वो रौशन हैं.....,
मगर उनके अंदर है,
 अंधेरा...बस अंधेरा !

अंजू चौधरी  - http://apnokasath.blogspot.in/

जब भी खुद को आईने मे देखा
उसे भी मुझ पे हँसते पाया ...
वक़्त के हाथो खुद को लुटा पाया ..
मै तो अंधेरो मे खो जाती ....
इस दुनिया की  भीड़ मे ..
अगर ..वो 
मेरा हाथ न थामता.....
खीँच लाया वो मुझे अंधेरो से बाहर .....
उसकी निगाहों ने तराशा है मुझे ..
उसकी  बातो से मिला है ..
जीवन मे नया रूप मुझे ..
मै तो खो चुकी थी ..
आत्मविश्वास अपना ...
पर उसकी बदौलत ..
जी ली मैने भी ...
अपने सपनो की  दुनिया ..
मिला प्यार इतना ....कि
मैंने खुद को उसके लिए बदल डाला..
समय पे साथ चलके उसे ने ...
मुझे नयी ताकत से रूबरू ..
करवा डाला ...
मेरी जीने की  इच्छा को
फिर से उसने ..जीवंत कर डाला ............
अब जब भी खुद को आईने मे देखा
अपना नया सा रूप है मैंने पाया |

 पूनम सिन्हा   - http://punamsinhajgd.blogspot.in/


बड़ी द्विविधा में हूँ आजकल......
किसे स्वीकार करूँ.....???
एक वो 'तुम' हो 
जिसे मैं अब तक जानती थी,
पहचानती थी...!
आज वो कहीं गुम हो गया है 
तुम में....तुम्हीं में....! 
और आज एक वो 'तुम' हो...
जो उस तुम से अनजान 
अपने जीवन की सारी सच्चाइयाँ 
अपने आप में समेटे मेरे समक्ष है.......!
हमेशा ही तुम्हें एक सहारे की खोज रही...
कभी इंसान,कभी भगवान...
घर,बाहर,अपने शहर से दूसरे शहर...
अपने-पराये...
सब में सहारा खोजते हुए 
तुम इतनी दूर निकल गए 
कि अब वापस आना भी  
मुमकिन नहीं रहा...!
शायद तुम ये अच्छे से जान भी गए हो...!
तभी तो आज 
अपने ही अहं को सबसे बड़ा 
सहारा बना लिया है तुमने !
इसमें मैं कहाँ हूँ तुम्हारे साथ.....??
इस 'तुम' को मैं जानती नहीं....
न ही पहचानती हूँ...!
और 'वो तुम' रहे नहीं...
कभी सोचूँ भी तो...... 
बोलो किसे स्वीकारूँ....???

(लेकिन ये द्विविधा मेरी अपनी है....तुम्हारी नहीं....!!)


अपर्णा त्रिपाठी "पलाश" - http://aprnatripathi.blogspot.in/

कितना सुहाना दौर हुआ करता था , जब खत लिखे पढे और भेजे जाते थे । हमने पढे लिखे और भेजे इसलिये कहा क्योकि ये तीनो ही कार्य बहुत दुष्कर लेकिन अनन्त सुख देने वाले होते थे ।
                               खत लिखना कोई सामान्य कार्य नही होता था , तभी तो कक्षा ६ मे ही यह हमारे हिन्दी के पाठ्यक्रम मे होता था । मगर आज के इस भागते दौर मे तो शायद पत्र की प्रासंगिकता ही खत्म होने को है । मुझे याद है वो समय जब पोस्ट्कार्ड लिखने से पहले यह अच्छी तरह से सोच लेना पडता था कि क्या लिखना है , क्योकि उसमे लिखने की सीमित जगह होती थी , और एक अन्तर्देशीय के तो बँटवारे होते थे , जिसमे सबके लिखने का स्थान निश्चित किया जाता था । तब शायद पर्सनल और प्राइवेट जैसे शब्द हमारे जिन्दगी मे शामिल नही हुये थे । तभी तो पूरा परिवार एक ही खत मे अपनी अपनी बातें लिख देता था । आज तो मोबाइल पर बात करते समय भी हम पर्सलन स्पेस ढूँढते है ।
                 पत्र लिखने के हफ्ते दस दिन बाद से शुरु होता था इन्तजार – जवाब के आने का ।जब डाकिया बाबू जी को घर की गली में आते देखते ही बस भगवान से मनाना शुरु कर देते कि ये मेरे घर जल्दी से आ जाये । और दो चार दिन बीतने पर तो सब्र का बाँध टूट ही जाता था , और दूर से डाकिये को देखते ही पूँछा जाता – चाचा हमार कोई चिट्ठी है का ? और फिर चिट्ठी आते ही एक प्यारे से झगडे का दौर शुरु होता – कि कौन पहले पढेगा ? कभी कभी तो भाई बहन के बीच झगडा इतना बढ जाता कि खत फटने तक की नौबत आ जाती । तब अम्मा आकर सुलह कराती । अब तो वो सारे झगडे डाइनासोर की तरह विलुप्त होते जा रहे हैं । 
                                   और प्रेम खतों का तो कहना ही क्या उनके लिये तो डाकिये अपनी प्रिय सहेली या भरोसेमंद दोस्त ही होते थे  । कितने जतन से चिट्ठियां पहुँचाई जाती थी , मगर उससे ज्यादा मेहनत तो उसको पढ्ने के लिये करनी पडती थी । कभी छत का एकान्त कोना ढूँढना पडता था तो कभी दिन मे ही चादर ओढ कर सोने का बहाना करना पडता था । कभी खत पढते पढते गाल लाल हो जाते थे तो कभी गालो पर आसूँ ढल आते थे । और अगर कभी गलती से भाई या बहन की नजर उस खत पर पढ जाये तो माँ को ना बताने के लिये उनकी हर फरमाइश भी पूरी करनी पडती थी।
खत पढते ही चिन्ता शुरु हो जाती कि इसे छुपाया कहाँ जाय ? कभी तकिये के नीचे , कभी उसके गिलाफ के अंदर , कभी किताब के पन्नो के बीच मे तो कभी किसी तस्वीर के फ्रेम के बीच में । इतने जतन से छुपाने के बाद भी हमेशा एक डर बना रहता कि कही किसी के हाथ ना लग जाय , वरना तो शामत आई समझो ।
                  अब आज के दौर मे जब हम ई – मेल का प्रयोग करते है , हमे कोई इन्तजार भले ही ना करना पडता हो , लेकिन वो खत वाली आत्मियता महसूस नही हो पाती । अब डाकिये जी मे भगवान नजर नही आते । आज गुलाब इन्तजार करते है किसी खत का , जिनमे वो सहेज कर प्रेम संदेश ले जाये । शायद खत हमारी जिन्दगी मे बहुत ज्यादा अहमियत रखते थे तभी तो ना जाने कितने गाने बन गये थे – चाहे वो – वो खत के पुरजे उडा रहा था हो या ये मेरा प्रेम पत्र पढ कर हो , चाहे चिट्ठी आई है हो या मैने खत महबूब के नाम लिखा हो ।आज चाहे ई –मेल हमारी जिन्दगी का हिस्सा जरूर बन गये हो मगर हमारी यादो की किताब मे उनका एक भी अध्याय नही , शायद तभी आज तक एक भी गीत इन ई-मेल्स के हिस्से नही आया ।
                        आज भी  मेरे पास कुछ खत है  जिन्हे मैने बहुत सहेज कर रक्खा है , मै ही क्यो आप के पास भी कुछ खत जरूर होंगे (सही कहा ना मैने)  और उन खतों को पढने से मन कभी नही भरता जब भी हम अपनी पुरानी चीजों को उलटते है , खत हाथ में आने पर बिना पढे नही रक्खा जाता ।

आज भी तेरा पहला खत
मेरी इतिहास की किताब में हैं
उसका रंग गुलाबी से पीला हो गया
मगर खुशबू अब भी पन्नो में है

उसके हर एक शब्द हमारी
प्रेम कहानी बयां करते है 
और तनहाई में मुझे
बीते समय में ले चलते हैं

वो खत मेरी जिन्दगी का
 हिस्सा नही ,जिन्दगी है   
 हर दिन पढने की उसे  
बढती जाती तिश्नगी है


इन भावनाओं में  ख़्वाबों,उम्मीदों की नाव हम भी डाल देते हैं - लिखें ख़त ..... बहुत अधिक ना सही,एक चुटकी तो पुराने दिन लौट आएँ 

8 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर....
    अति सुन्दर....

    आभार दी
    अनु

    उत्तर देंहटाएं
  2. तहे दिल से आभार जो आपने मेरी पोस्ट को इस काबिल समझा, पुनः साधुवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  3. rashmi ji , bahut khushi hui , hmare vicharo ko aapne anpe bolg par jagah di.
    sach aapka comment dene ka ye style to bahut hi khoob rha, jo k kewal comment na rh kr ek gift bhi hai
    thanks ...

    उत्तर देंहटाएं
  4. रश्मि जी...बेहद सुन्दर चयन..हरेक रचना नायब है!

    उत्तर देंहटाएं
  5. आत्मा के इंधन से बने शाब्दिक भोजन,
    लम्हों की भूख मिटेगी - सच्ची ................ यक़ीनन

    सादर

    उत्तर देंहटाएं