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बुधवार, 19 सितंबर 2012

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजे ...


प्रेम को जानने के लिए आसक्ति होनी चाहिए, जुनून होना चाहिए, उसमें डूबे रहना चाहिए . प्रेम और भगवान्‌ को एक ही तत्व माना जाता है ...
प्रेम कभी भी शरीर की अवधारणा में नहीं सिमट सकता ... प्रेम वह अनुभूति है जिसमें साथ का एहसास निरंतर होता है ! न उम्र न जाति न उंच नीच ... प्रेम हर बन्धनों से परे एक आत्मशक्ति है , जहाँ सबकुछ हो सकता है .
कुछ पुराने कुछ नए - प्रेम के हर ढंग नए -
कवि पन्त की प्रेम अभिव्यक्ति आँखों के आगे एक हरीतिमा का निर्माण करती है,जिसकी हर लताओं से अगर की शाब्दिक खुशबू एक आध्यात्मिक सौंदर्य स्थापित करती है -
बाँध दिए क्यूँ प्राण प्राणों से
तुमने चिर अनजान प्राणों से ..
गोपन रह न सकेगी
अब यह मर्म कथा
प्राणों की न रुकेगी
बढ़ती विरह व्यथा
विवश फूटते गान प्राणों से
बाँध दिए क्यूँ प्राण प्राणों से
तुमने चिर अनजान प्राणों से ..
यह विदेह प्राणों का बंधन
अंतर्ज्वाला में तपता तन
मुग्ध हृदय सौन्दर्य ज्योति को
दग्ध कामना करता अर्पण
नहीं चाहता जो कुछ भी आदान प्राणों से
बाँध दिए क्यूँ प्राण प्राणों से
तुमने चिर अनजान प्राणों से ..’

महादेवी और प्रेम -जब सूक्ष्म एकाकार हो अनुभूतियाँ तो फिर प्रेम का परिचय क्या -
तुम मुझमें प्रिय, फिर परिचय क्या!

तारक में छवि, प्राणों में स्मृति
पलकों में नीरव पद की गति
लघु उर में पुलकों की संस्कृति
भर लाई हूँ तेरी चंचल
और करूँ जग में संचय क्या?

तेरा मुख सहास अरूणोदय
परछाई रजनी विषादमय
वह जागृति वह नींद स्वप्नमय,
खेल खेल थक थक सोने दे
मैं समझूँगी सृष्टि प्रलय क्या?

तेरा अधर विचुंबित प्याला
तेरी ही विस्मत मिश्रित हाला
तेरा ही मानस मधुशाला
फिर पूछूँ क्या मेरे साकी
देते हो मधुमय विषमय क्या?

चित्रित तू मैं हूँ रेखा क्रम,
मधुर राग तू मैं स्वर संगम
तू असीम मैं सीमा का भ्रम
काया-छाया में रहस्यमय
प्रेयसी प्रियतम का अभिनय क्या?...

हरिवंशराय बच्चन और सामीप्य की अनकही भावनाएं -
रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।
फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में
और चारों ओर दुनिया सो रही थी
तारिकाएँ ही गगन की जानती हैं
जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी
मैं तुम्हारे पास होकर दूर तुमसे
अधजगा-सा और अधसोया हुआ सा
रात आधी खींच कर मेरी हथेली
रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।
एक बिजली छू गई सहसा जगा मैं
कृष्णपक्षी चाँद निकला था गगन में
इस तरह करवट पड़ी थी तुम कि आँसू
बह रहे थे इस नयन से उस नयन में
मैं लगा दूँ आग इस संसार में है
प्यार जिसमें इस तरह असमर्थ कातर
जानती हो उस समय क्या कर गुज़रने
के लिए था कर दिया तैयार तुमने!
रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।
प्रात ही की ओर को है रात चलती
औ’ उजाले में अंधेरा डूब जाता
मंच ही पूरा बदलता कौन ऐसी
खूबियों के साथ परदे को उठाता
एक चेहरा-सा लगा तुमने लिया था
और मैंने था उतारा एक चेहरा
वो निशा का स्वप्न मेरा था कि अपने पर
ग़ज़ब का था किया अधिकार तुमने।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।
और उतने फ़ासले पर आज तक सौ
यत्न करके भी न आये फिर कभी हम
फिर न आया वक्त वैसा फिर न मौका
उस तरह का फिर न लौटा चाँद निर्मम
और अपनी वेदना मैं क्या बताऊँ
क्या नहीं ये पंक्तियाँ खुद बोलती हैं--
बुझ नहीं पाया अभी तक उस समय जो
रख दिया था हाथ पर अंगार तुमने।
रात आधी खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था 'प्यार' तुमने।....

प्यार युगों से प्रवाहित गंगा,गोमती,गोदावरी....काश्मीर से कन्याकुमारी तक सुवासित, त्रिवेणी में अदृश्य सरस्वती की अद्वैत आभा... जिसने प्रेम न जिया हो,उसका जिया अनजिया रह गया समझो !
प्रेम तो खुद में व्याख्यायित है,उसकी क्या व्याख्या...तो बस प्रेम के कुछ ख़ास अनमोल कैनवस आपके लिए, जिसके हर रंग पुख्ता हैं - तो रखिये शब्द शब्द सीढ़ियों पर नर्म आँखें और गाहे गाहे इसे पढ़ते जाइये,क्योंकि इससे बेहतर कोई किताब नहीं ............
रवीन्द्र प्रभात - http://www.blogger.com/profile/11471859655099784046

ख़्वाबों की ताबीर तुम्हारी आँखों में है,
शोख़ जवाँ काश्मीर तुम्हारी आँखों में है।

तुझमें है ताबीर मोहब्बत की भीतर तक,
शायर गालिब-मीर तुम्हारी आँखों में है।

सुबहे काशी का मंजर ओ' शाम अवध का,
क्या सुन्दर तस्वीर तुम्हारी आँखों में है।

छलकाए अंगूरी नेह लुटाए हौले से,
राँझा की ओ हीर तुम्हारी आंखों में है।

ताजमहल का अक्स नक्श एलोरा का,
प्यार की हर जागीर तुम्हारी आँखों में है।
भरी उमस में पिघल-पिघल के बरसे जो,
हिमाचल की पीर तुम्हारी आँखों में है।

बूँद-बूँद को तरस उठे जो देखे बरबस,
राजस्थानी नीर तुम्हारी आँखों में है।

गोरी गुज़रती गुड़िया शर्मीली-सी,
सागर-सी गम्भीर तुम्हारी आँखों में है।

चाँद सलोना देख-देख के सागर झूमे,
गोया की तासीर तुम्हारी आँखों में है।

कान्हा नाचे रास रचाए छलकाए,
रोली-रंग-अबीर तुम्हारी आँखों में है।

तिरुपती की पावन मूरत सूरत-सी,
दक्षिण की प्राचीर तुम्हारी आँखों में है।

तमिल की ख़ुशबू कन्नड़-तेलगू की चेरी,
झाँक रही तदबीर तुम्हारी आँखों में है ।

खजुराहो की मूरत जैसी रची-बसी हो,
छवि सुन्दर-गम्भीर तुम्हारी आँखों में है ।

गीत बिहारी गए, बजे संगीत रवीन्द्र,
भारत की तकदीर तुम्हारी आँखों में है। ...

रंजना भाटिया - http://ranjanabhatia.blogspot.in/
काश मैं होती धरती पर बस उतनी
जिसके उपर सिर्फ़ आकाश बन तुम ही चल पाते
या मैं होती किसी कपास के पौधे की डोडी
जिसके धागे का तुम कुर्ता बना अपने तन पर सजाते
या मैं होती दूर पर्वत पर बहती एक झरना
तुम राही बन वहाँ रुक के अपनी प्यास बुझाते
या मैं होती मस्त ब्यार का एक झोंका
जिसके चलते तुम अपने थके तन को सहलाते
या मैं होती दूर गगन में टिमटिम करता एक तारा
जिसकी दिशा ज्ञान से तुम अपनी मंजिल पा जाते
यूँ ही सज जाते मेरे सब सपने बन के हक़ीकत
यदि मेरी ज़िंदगी के हमसफ़र कही तुम बन जाते !!...

संगीता स्वरुप - http://geet7553.blogspot.in/

याद है तुम्हें ?
एक दिन
अचानक आ कर
खड़े हो गए थे
मेरे सामने तुम
और पूछा था तुमने
कि - तुम्हें
गुलमोहर के फूल
पसंद हैं ?
तुम्हारा प्रश्न सुन
मैं स्वयं
पूरी की पूरी
प्रश्नचिह्न बन गयी थी ।
न गुलाब , न कमल
न मोगरा , न रजनीगंधा ।
पूछा भी तो क्या
गुलमोहर?
आँखों में तैरते
मेरे प्रश्न को
शायद तुमने
पढ़ लिया था
और मेरा हाथ पकड़
लगभग खींचते हुए से
ले गए थे
निकट के पार्क में ।
जहाँ बहुत से
गुलमोहर के पेड़ थे।
पेड़ फूलों से लदे थे
और वो फूल
ऐसे लग रहे थे मानो
नवब्याहता के
दहकते रुखसार हों ।
तुमने मुझे
बिठा दिया था
एक बेंच पर
जिसके नीचे भी
गुलमोहर के फूल
ऐसे बिछे हुए थे
मानो कि सुर्ख गलीचा हो।
मेरी तरफ देख
तुमने पूछा था
कि
कभी गुलमोहर का फूल
खाया है ?
मैं एकदम से
अचकचा गयी थी
और तुमने
पढ़ ली थी
मेरे चेहरे की भाषा ।
तुमने उचक कर
तोड़ लिया था
एक फूल
और उसकी
एक पंखुरी तोड़
थमा दी थी मुझे ।
और बाकी का फूल
तुम खा गए थे कचा-कच ।
मुस्कुरा कर
कहा था तुमने
कि - खा कर देखो ।
ना जाने क्या था
तुम्हारी आँखों में
कि
मैंने रख ली थी
मुंह में वो पंखुरी।
आज भी जब
आती है
तुम्हारी याद
तो
जीव्हा पर आ जाता है
खट्टा - मीठा सा
गुलमोहर का स्वाद।



वंदना गुप्ता - http://vandana-zindagi.blogspot.in/

दौड़ती भागती रही उम्र भर
तेरे इश्क की कच्ची गलियों में
लगाती रही सेंध बंजारों की टोलियों में
होगा कहीं मेरा बंजारा भी
जिसकी सारंगी की धुन पर
इश्क की कशिश पर
नृत्य करने लगेंगी मेरी चूड़ियाँ
रेशम की ओढनी पर
लगी होंगी जंगली बेल बूँटियाँ
और बजती होंगी किसी
मंदिर की चौखट पर
इश्क की घंटियाँ
स्वप्न के पार होगी कहीं
कोई स्वप्निली घाटियाँ
जिसके एक छोर पर
सारंगी बजाता होगा मेरा बंजारा
और दूसरे छोर पर
कोई रक्कासा की परछाईं
करती होगी नृत्य सांझ की चौखट पर
एक धूमिल अक्स झुक रहा होगा आसमाँ का
करने कदमबोसी इश्क की ..........
सुनो ............आवाज़ पहुंची तुम तक ?
मेरे ख्वाबों की चखरी पर
हकीकत का मांजा क्यों नहीं चढ़ता ?
ये आखिरी ख़त की भाषा
कोई रंगरेज क्यों नहीं समझता ?
शायद अब इश्क की बारातें नहीं निकला करतीं
जनाजों की धूम खामोश होने लगी है
तभी तो देखो ना ..................
मैंने जो पकड़ी थी एक लकीर हाथों से
उसके बस निशाँ ही हथेली पर पसरे पड़े हैं
मगर कोई ज्योतिषी बूझ ही नहीं पा रहा
इश्क का ज्ञान .............
देखो ना मेरी हथेली पर
सारी रेखाएं मिट चुकी हैं
सिर्फ इश्क की रेखा ही कैसे टिमटिमा रही है
फिर भी नहीं कर पा रहा कोई भविष्यवाणी
अब ये भविष्य वक्ता का दोष है या इश्क की इन्तेहाँ
जो बस सिर्फ एक रेखा का गणित ही
सवाल हल नहीं कर पा रहा
और देखो तो ............सदियाँ बीत गयीं
सुलझाते सुलझाते धागे की उलझन को
बालों में उतरी चाँदी गवाह है इसकी
जितना सुलझाने की कोशिश करती हूँ
जितना मौलवी से कलमे पढवाती हूँ
ताबीज़ गढ़वाती हूँ
ये नामुराद इश्क की रेखा उतनी ही सुर्ख हो जाती है
ना ना .........इश्क की रेखा हर हथेली में नहीं होती
और जिसमे होती है तो वहाँ
बस सिर्फ एक वो ही रेखा होती है
और मेरी हथेली की जमीन देखो तो ज़रा
कितनी चमक रही है
बर्फ की चादर बिछी है
जिसकी मांग सिन्दूर से भरी है
अमिट है मेरा सुहाग ......जानते हो ना
तभी तो दिन पर दिन
सुहागरेखा कैसे गहरा रही है
इसीलिए अब बंद रखती हूँ मुट्ठी को
कहीं नज़र ना लग जाए
वैसे तुम्हारी नज़र का
इन्तखाब तो आज भी है
मगर इंतज़ार के पुलों पर
ख्वाबों के बाँध बांधे तो
युगों बीत गए .........
क्या पहुँचा तुम तक
इंतज़ार -ओ-इश्क का जूनून
जानती हूँ नहीं पहुँचा होगा
तभी तो लहू का रिसना जारी है
यूँ ही इश्क का सुहाग अमर नहीं होता
जब तक ना दर्द का लहू रिसता
और फिर बंजारों की टोलियाँ
वैसे भी कब महलों की मोहताज हुई हैं
इश्क की चादरें तो बिना धागों के बुनी जाती हैं
और मेरी हथेली के बीचो बीच खिंची रेखा तो
लक्ष्मण रेखा से भी गहरी है , अटल है , तटस्थ है
जो इश्क की सुकूनी हवाओं की मोहताज नहीं
ओ मेरे इश्क के बंजारे ...........तू जहाँ भी है
याद रखना ...........एक दिन इश्क के जनाजे में ताशे तू ही बजा रहा होगा
और मेरा इश्क गुनगुना रहा होगा
रब्बा इश्क के पाँव में मेहंदी लगा दे कोई
इक शब की दुल्हन बना दे कोई ............
फिर भी कहती हूँ
यूँ इश्क के पेंचोखम में उलझना ठीक नहीं होता ...............जान की कीमत पर
क्योंकि
इंसानियत की रूह जब उतरती है
तब इश्क की दुल्हन अक्स बदलती है ...........और आइनों पर लिबास नहीं होते
देख लेना आकर क़यामत के रोज़ मेरी हथेलियों की सुर्ख रंगत ..........
जो किसी मेहंदी की मोहताज नहीं
फिर चाहे तेरे इंतज़ार की ही क्यों ना हो ............
इश्क का पंचनामा ऐसे भी हुआ करता है …………ओ मेरे बंजारे !!!!!!!!

संध्या शर्मा - http://sandhyakavyadhara.blogspot.in/

तरंग सरिता की
हिलोरें लेने लगीं
नयनो में
बांध भावनाओं का
फूट पड़ा
शिथिल कर गईं
पलकों को
भावहीन हवाएं
अंतस अनंत गहरा
घोर अँधेरा
मौन हूँ मैं
और तुम....!
बह रहे हो
झर-झर
इन नयनो से
झरने की तरह
क्यों ना तुम
भींच लो मुट्ठी
निचोड़ दो बादलों को
भर दो प्रणय सरिता
और मैं....!
समेट लूँ तुमको
मूंदकर पलकें....

सोनल रस्तोगी - http://sonal-rastogi.blogspot.in/
एक बात कहूं गर करो यकीं
ऐसा पहले कुछ हुआ नहीं
जैसा पल पल अब होता है
जैसा हर पल अब होता है
मैं जगते जगते सोती हूँ
और सोते से जग जाती हूँ
रातों को करवट लेती हूँ
ना जाने क्यों मुस्काती हूँ
अन्जानी सी सिरहन कोई
भीतर से अक्सर उठती है
जो कह देते हो बात कोई
क्यों मेरी आँखे झुकती हैं
जादू तो तुमने किया नहीं
ख़ामोशी मैं सुन लेती हूँ
गुमसुम सी मैं हो जाती हूँ
लगता है कुछ पा जाती हूँ
खुद जाने क्यों खो जाती हूँ
पूछूं गर तो सच कहना
प्यार यही तो होता है :-)

उषा राय - http://ushadr.blogspot.in/
शंख हो तुम !
तुम्हारे भीतर विराजता है एक समुन्दर ,
चांदनी बगल में लेट जाती है ,
इन्द्रधनुष सी बिखरती है हँसी,
परत दर परत झिलमिलाता है उजाला ,
कोमल बिजली सा कौंधता है रूप ,
ये तुम हो !
पूरी की पूरी शंख जैसी !!!...................

प्यार की चाँदनी कहो या चाशनी या चाँदनी में गिरती ओस की बूंदें- कहो या जियो...प्यार तो बस प्यार है
क्रमशः ...

मंगलवार, 18 सितंबर 2012

ब्लॉग वृक्ष पर तरह तरह के फूल और फल


जीवन कहीं भी ठहरता नहीं है,पर ताम्र-पत्रों पर,शिलालेखों पर,सिक्कों पर,....कई आरम्भ,उत्तरोत्तर विकास अंकित हैं.युग हो,वेद हो,ग्रन्थ हो...हमारे लिए किसी न किसी ने सुरक्षित किया . शुरू में कई कथन हमें ख़ास नहीं लगते,पर समय की गति के साथ उसकी विशेषता बढ़ती है. जैसे ब्लॉग परिक्रमा पर रवीन्द्र प्रभात का यह प्रयास -

समीर लाल और उनके ब्लॉग का आरम्भ http://udantashtari.blogspot.in/2006/03/blog-post.html

सलिल वर्मा यानि बिहारी बाबू फंसे यूँ http://chalaabihari.blogspot.in/2010/04/blog-post.html

कुछ शुरुआत रंगमंच पर एक झलक बन ओझल हो जाता है,कारण-परिणाम से हम अनभिज्ञ अटकलें लगाते हैं...पर बलवंत पटेल की इस ख़ुशी के बाद कुछ नहीं होना कई सवाल देता है,शून्य में उसकी तलाश होती है...शायद कोई जवाब हो आपके पास, देखिये तो

रविशंकर श्रीवास्तव ने जब बनाया ब्लॉग तो क्या कहा - पढ़िए यहाँ

अमरेन्द्र कुमार ने जब ब्लौगिंग शुरू की तो सबकुछ विस्तार से कहा .... यह कोई व्याख्या नहीं, बस आरम्भ का सूत्र है,जिसे देखना सुखकर लगा तो संजो लायी आप तक -

अब आपके सामने ला रही हूँ मेरा इंटरनेट प्रेम और पहला ब्लॉग :) अभि की कलम से http://abhi-cselife.blogspot.in/2010/07/blog-post_07.html

क्या लिखू, क्या कहूं? अंकुर श्रीवास्तव का अपना ढंग,सच के रंग - http://ankura107.blogspot.in/2010/03/blog-post.html

चर्चाकार रविशंकर श्रीवास्तव और चिटठा चर्चा का पहला ब्लॉग गीत और ब्लॉग गान... http://chitthacharcha.blogspot.in/2007/11/blog-post.html

वटवृक्ष का बीजारोपण कुछ यूँ


कहते हैं समय ठहरता नहीं , मौसम बदलते हैं , तेवर बदलते हैं , चाँद भी पूर्णता से परे होताहै और अमावस की रात आती है ... यूँ कहें अमावस जीवन का सत्य है, एक अध्यात्म की खोज -जहाँ से ज्ञान मार्ग शुरू होता है . कभी राम, कभी कृष्ण , कभी बुद्ध , कभी साई, कभी श्री ... जो अमावस को प्रकाशमय करते हैं और कहते हैं - समय, मौसम, तेवर , पूरा चाँद सब तुम्हारे भीतर हैं , थोड़ी देर रुको खुद को पहचानोऔर जानो...........
वटवृक्ष एक ठहराव है, खुद को जानने का, दुनिया को बताने का.......

() रश्मि प्रभा






परिचय,आरम्भ अनगिनत हैं...ढूंढ तो लॉन मैं- आप देंगे इतना वक़्त एक ही दिन ?

रविवार, 16 सितंबर 2012

आज भी हिंदी साहित्य अपने नौ रसों के साथ जिंदा है


हिंदी का उत्थान चाहते हैं तो लिखने के साथ साथ सही मायनों में उसे पढ़ें भी .... आज भी हिंदी साहित्य अपने नौ रसों के साथ जिंदा है . लिखने से परहेज नहीं,तो पढ़ने से क्यूँ ! लिखिए,पढ़िए...जानिए उस कलम को,जिसमें परिवर्तन के बयार समाहित होते हैं .रोते जाना,चीखना,किसी को लक्ष्य बनाना .....सही नहीं,बेहतर है-खुद को मजबूत बनायें.समस्यायों की बन्द सांकलों को खोलते हुए मजबूती के मजबूत मंत्र दिए हैं अनवर जमाल ने http://auratkihaqiqat.blogspot.in/2012/09/blog-post_15.html
किसी अन्य के कहे को प्राथमिकता देने से बेहतर है खुद को जानें,खुद को समयानुसार बदलें...जितना भले के लिए है-उसे सुनें,जोव्यर्थ,अनर्गल प्रलाप है,उसे कूड़ेदान में ही डालें !

जो जैसा है- है, तो फिर हम भी वैसे ही रहें जो हम हैं.हिंसा के प्रत्युत्तर में हिंसा, अपशब्द के प्रत्युत्तर में हिंसा - निदान नहीं,बल्कि एक ज्वालामुखी की संरचना है .सुज्ञ जी ने एक गूढ़ तथ्य दिया है http://shrut-sugya.blogspot.in/2012/09/blog-post_14.html ये तथ्य अनुभवों की ठोस लकीरें हैं . कई लोग अपने बच्चों को सिखाते हैं कि कोई मारे तो पलटकर मारो....यह सीख देते हुए वे भूल जाते हैं कि यह पलटवार उनके साथ भी संभव है! संस्कारों का महत्व,मीठे बोल का महत्व हमेशा होता है. परिवर्तन इसी से होता है ...
हिंसा में इन्सां कहाँ
इन्सां नहीं तो सभ्यता कहाँ
असभ्य से सभी होने पर ही इन्सां आविष्कारक हुआ
असभ्यता तो सिर्फ पतन है ...
अन्याय से भयमुक्त होकर चलना है
तलवार उठाना तो लाशें गिरना है
और लाशों में निर्णय कहाँ !....

धर्म से जुडी कहानियों में बहुत कुछ ऐसा कह दिया जाता है, जिसकी व्याख्या उसके औचित्य पर प्रश्न उठाती है. कुछ ऐसे ही प्रश्न उठाये हैं कुलभूषण सिंघल ने http://awara32.blogspot.in/2012/09/blog-post.html की प्रासंगिक व्याख्याओं के मध्य .किसी भी बात को दोनों अर्थ में समझा जाता है,फिर एक निर्णय,एक मान्यता अपनी होती है ...

दुखों की श्रृंखला भले ही मनुष्य बनाये,पर दोषी ईश्वर होता है.प्रश्न उससे ही होते हैं, सही भी है- माता-पिता से ही तो अधिकारवश प्रश्न किये जाते हैं.एक प्रश्न सुधीर मौर्य का रिंकल के दर्द को लेकर http://sudheer-maurya.blogspot.in/2012/09/blog-post_13.html
प्रश्नों के इस दर्द में ईश्वर भी रोता है,अपने द्वारा रचित मानव की दुर्भावनाओं पर पश्चाताप करता है !

पढ़ाई के दरम्यान हम सब सोचते हैं-ओह कब गुजरेगा यह समय! पढ़ना-लिखना,...समय से उठो,क्लास जाओ,आओ-होमवर्क करो...पर जब समय बीत जाता है तो बस यादें यादें यादें...यादें रह जाती हैं . इन्हीं यादों की सजीव बानगी है मुकेश कुमार सिन्हा की http://jindagikeerahen.blogspot.in/2012/09/blog-post_15.html

ज़रूरी नहीं की हम जो पसंद करते हैं,सोचते हैं,गुनते हैं,गढ़ते हैं-उसे अभिव्यक्त भी कर सकें. जहाँ वह अभिव्यक्ति मिल जाती है,वह हमारी पसंद बन जाती है और उसे साझा करके ख़ुशी मिलती है...इसी ख़ुशी को साझा करते हैं इमरान अंसारी - ख़लील ज़िब्रान की अभिव्यक्तियों के साथ . तो मौका ना चुकें और पढ़ें http://khaleelzibran.blogspot.in/2012/07/blog-post.html
यही वास्तविकता है ...

कलियुग...जब शुरू हुआ था यह युग तो संस्कारों की साँसें चल रही थीं...धर्म का सम्मान था,रिश्तों का सम्मान था,अतिथि देवो भवः की भावना में सम्मान था...किसी के आने की ख़ुशी, किसी को कुछ देने की छोटी छोटी खुशियाँ बहुत मायने रखती थीं.बड़ा परिवार ही सही मायनों में सूखी परिवार था, झूठ-फरेब थे,पर अब तो यही शेष है ... गौर कीजिये रेखा श्रीवास्तव जी की इस विलक्षण रचना पर http://hindigen.blogspot.in/2012/09/blog-post_9692.html

कहीं धूप तो कहीं छाँव,किसी के घर रिमझिम,कोई बूंद पानी को तरसे....मौसम के रूप भी निराले हैं, कहते हैं रूपचंद्र शास्त्री जी

मृगतृष्णा कहो या तृष्णा
उपलब्धि मानो या घाटे का सबब
मैं हूँ और रहूंगी....क्योंकि सृष्टि मुझसे है
और मैं कर्त्तव्य से अलग न थी न हूँ न हो सकती हूँ ...
सर पर एक हाथ हो- इतनी छोटी सी उम्मीद
महँगी तो नहीं ... सरस दरबारी की अभिव्यक्ति रेगिस्तान में पानी का कतरा नहीं,पूरी नदी है . इक्षा स्रोत है,सुनामी भी है-इसी फर्क को समझना है


कहना है उस अभिमानी आकाश से
कि उसके विस्तृत दामन पर
जो गिनकर वक़्त बांटा है घड़ी ने
सूरज के बराबर ही हिस्सा है
उसमें सितारों का भी ......लो आकाश पर भी होड़ लग गई,धरती का भाप आकाश तक !तुलिका शर्मा ने किया है हिसाब - क्योंकि,
घुप्प अंधेरी रात के खेत में
बन्द आँखों से कल जो हमने
सितारों की फ़सल बोई थी
सुबह सूरज आकर रौंद गया है ...http://mankacanvas.blogspot.com/2012/09/blog-post_15.html

आइये हमने बीच खुशियाँ बाँटें,छोडकर शिकायतें कुछ पल जी लें- वरना एक दिन तो यही गाना है कि बिछड़े सभी बारी बारी ...
बिछड़ने से पहले आपस के एक गुण की चर्चा करें - निष्पक्ष भाव से,मैत्री का हाथ बढ़कर....
उम्मीद का सूरज कभी नहीं ढलता
अँधेरा कितना भी गहरा हो
रौशनी बनकर चलता है ...

शनिवार, 15 सितंबर 2012

सही शब्दों की ताकत है तो कर लो दुनिया मुट्ठी में ...


यदि तुम्हारे पास सही शब्दों की ताकत है तो कर लो दुनिया मुट्ठी में ...
शब्द देते हैं हौसला
शब्द विश्वास
शब्द से दूरियां मिट जाती हैं
कहो तो ...

शब्द करते हैं आह्वान,माध्यम है रिश्तों को बचाने का,धरा को बचाने का - शब्दों का इन्कलाब हो तो सूखी धरती हरी हो जाए,सूखे नैनों से आंसू छलक जाएँ,दुर्गा का आगमन हो,विघ्नहर्ता विघ्न हर लें,........सबकुछ संभव है शब्दों से. अदितिपूनम की पुरवाई शब्दों से आह्वान कर रही है इस रचना में http://purvaai.blogspot.in/2012/08/blog-post.html

ज़िन्दगी हमेशा एक नए आयाम देती है विचारों का .... अधिकतर हम जो कहते हैं, उसके अलग मायने निकलते हैं क्योंकि कहने सुनने समझने और लेने में अपनी सोच भी शामिल होती है ...
आत्मचिंतन अपनी आत्मा का चिंतन होता है, जो कुछ भी होता है उसे लेकर . रश्मि प्रभा का चिंतन सदा के ब्लॉग पर http://aatamchintanhamara.blogspot.in/2011/12/blog-post_17.html दिल पर हाथ रखकर कहिये, सच है न ?

जैसे जब किसी की बेटी के साथ कोई दुर्घटना हो जाती है,उसका पति से अलगाव हो,या जीते जी अग्नि संस्कार-जितने मुंह उतनी बातें! क्योंकि अनहोनी दूसरे के घर की समस्या है, बिना सच जाने कुछ भी कहना क्या न्यायोचित है ? आखिर कब तक चलेगा अन्याय का सिलसिला और आत्मा न्याय के लिए भटकेगी ?????? संध्या तिवारी मांगती है जवाब उन रूहों के एवज में -

ठगी इतनी बढ़ गई है कि शक,कुफ्ती बढ़ गई है... पर कई बार परिस्थितियाँ किसी तक जाने के लिए माध्यम ढूंढ लेती हैं. पंडित जी की यह कहानी मन को झकझोरती है, उनका आना,उनकी परिस्थिति ईश्वर के आने सा लगा ..... क्रमशः है कहानी,पढ़ना तो शुरू कीजिये मीता पन्त की इस कहानी को http://meetapant-dreams.blogspot.in/2012/09/blog-post_2685.html

आम दिनचर्या - एक गृहणी की,सबका आईना है ... जो छोटा लगता है,पर बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण है .मृदुला प्रधान की रचना http://blogmridulaspoem.blogspot.in/2012/09/blog-post_13.html में अपनी छवि दिखेगी,कुछ जोड़-घटाव के संग .

प्रेम पत्र :)))))))))))))) सुनते एक मुस्कान कौतुहल से भरी सबकुछ पढ़ लेना चाहती है और वह सबकुछ लिख देना चाहती है ... अनु ने लिखा है http://allexpression.blogspot.in/2012/09/blog-post_14.html लिखो,सहेजो,पढ़ो,ना पढ़ो.....प्रेम है तो है ...

क्षितिज भ्रम नहीं,पर पहुँच से दूर हमने खट्टे अंगूरों की तरह मान लिया है उसे भ्रम,तभी तो धरती भी भ्रमित आकाश से कहती है अपनी चाह शालिनी की इस रचना में

रूद्र के सर में दर्द है,भावना का परेशान होना लाजिमी है-माँ जो है. और रूद्र तुम टीवी मत देखो, हम सब की दुआ है, आशीर्वाद है - तुम हमेशा स्वस्थ और मस्त रहो .... हम नहीं पढ़ना चाहते यह
हम चाहते हैं ये http://rudrapandey.blogspot.in/2012/08/blog-post_5.html :)


रूद्र के लिए हिदायत के साथ लेती हूँ विराम,कल तो हमारे साथ आएगा ही आज बनकर,फिर होगी कुछ सौगात आपके लिए और मेरे लिए भी ....

शुक्रवार, 14 सितंबर 2012

लेखन का मूल्य



कविता हो,या कहानी.... नहीं कुछ भी बेमानी.भले इससे तन ना ढंके,भूख ना मिटे,-पर एक अव्यक्त सुकून मिलता है ! जो सही मायनों में लिखते हैं,उनकी लेखनी विष वमन नहीं करती,...वह तो हर क्षेत्र में इन्द्रधनुष से उभरते हैं. स्वान्तः सुख ही औरों को सुख देता है,अपना अर्थ दूसरों में मिलता है . पर जो शब्दों को तोड़ता मरोड़ता है,वह कवि नहीं होता. बारूद से तैयार शब्द कवि के हो ही नहीं सकते . इसी व्यथा में कहा है अमृता तन्मय ने कुछ यूँ कि http://amritatanmay.blogspot.in/2012/09/blog-post_13.html
कवि का क्या भरोसा ?
कब क्या कह दे
मात खायी बाज़ी पर भी
शह पर शह दे...
कविता का क्या मोल है ?
हिसाब में बड़ा झोल है...
क्या ये नारियल का खोल है ?
या फूटी हुई ढोल है ?...

दिवसीय प्रेम,दिवसीय महिलाओं की उपलब्धि,दिवसीय माता-पिता का महत्व, दिवसीय हिंदी की महिमा !....यह जागरण नहीं,दिखावा है - हिंदी भाषा नहीं,सबको जोड़ने की सबसे सरल कड़ी है, समझो तो प्रेम,दर्द,कल्पना जो हिंदी में है,उसकी बात ही जुदा है! नव रस जीवन के सही मायनों में हिंदी के हैं . क्षुब्धता की स्थिति में कहती हैं कविता रावत http://kavitarawatbpl.blogspot.in/2012/09/blog-post.html
क्या बात है जो विश्व के बड़े-बड़े समृद्धिशाली देश ही नहीं अपितु छोटे-छोटे राष्ट्र भी अपनी राष्ट्रभाषा को सर्वोपरि मानकर अपना सम्पूर्ण काम-काज बड़ी कुशलता से अपनी राष्ट्रभाषा में संपन्न कर तरक्की की राह चलते हुए अपने आप को गौरवान्वित महसूस करते हैं वहीँ दूसरी ओर सोचिये क्यों विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में अपनों की बीच उनकी राष्ट्रभाषा कहलाने वाली हिन्दी अपना वर्चस्व कायम करने में आज तक असमर्थ बनकर अपनों के बीच आज पर्यंत बेगानी बनी हुई है?

जीवन खुद के प्रश्नों में उलझा हुआ खुद को तलाशता है,कभी भीतर कभी बाहर,कभी तम में कभी प्रकाश में,कभी मृत्यु रुदन में ढूंढता है अपना अस्तित्व,कभी अकेलेपन में अपनी परछाईं को पहचानने की अथक कोशिश करता है.साँसों का चलना मात्र तो जीवन नहीं ! सुनिए अनामिका की सदायें http://anamika7577.blogspot.in/2012/07/blog-post_18.html
आह ! विश्वास और संदेह का
ये मोहक मिलन !!
कैसी विडंबना है ये
मैं जीवन के हर क्षण में
भयभीत हूँ !!...

सम्मान,सम्मान,सम्मान - अब लिखने से अधिक सब इसके लिए हैं परेशान -
जिसे मिला,उसमें क्या था ख़ास,
मेरे लेखन पर क्यूँ न हुआ विश्वास !
माथापच्ची और समाधान में है परेशान,हैरान सारे कद्रदान, तो मिल गया एक कार्टून काजल कुमार की कूची को -
ये है तमाशा,जिससे फैली निराशा !

कई बार हम बहुत कुछ कहना चाहते हैं,सुनना चाहते हैं-पर मन की त्रिवेणी में कभी गंगा,कभी यमुना,कभी लुप्त सरस्वती के मध्य आध्यात्म को जीते हुए भी रह जाते हैं मौन - कुछ यूँ
http://anupamassukrity.blogspot.in/2012/09/blog-post_12.html अनुपमा सुकृति और उनके अनकहे शब्द ...
मूर्तिकार,रचनाकार,कलाकार,सृष्टिकर्ता,भाग्यविधाता,...कहीं न कहीं है बाध्य,रह जाती है सूक्ष्म कमी और वहीँ से आरम्भ होता है शब्दों के यज्ञ में भी एक मौन !

अनुनाद-छोटा स्वर,एक प्रत्युत्तर . जितने गहरे जाओ,अर्थ उतना ही गहरा मिलता है.हर गहराई के अलग मायने,पर गहराई ज़रूरी है अनुनाद के लिए.बीज न हो तो प्रस्फुटन कैसा,वाद्य यंत्रों पर स्पर्श न हो तो आवाज़ कैसी . विमलेन्दु की रचना http://uttampurush.blogspot.in/2012/09/blog-post_11.html
चन्द्रमा गूँजता है
पृथ्वी की कक्षा में
तो रोशनी मुस्कुराती है
गहरी रात में भी ।....

इस अनुनाद के लिए पढ़िए,भावनाओं के साथ संगत कीजिये,तब जानेंगे लेखन का मूल्य ....

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

तपस्वियों सी हैं अटल अभिव्यक्तियाँ


तुम लाख कहो अलविदा
भावनाएं तो पुरवा का झोंका है
कभी मुस्कुराती
कभी खिलखिलाती
कभी गुनगुनाती
कभी सिसकती
कभी मौन सी छू ही जाती है....
.....पर अरुणा कपूर ने की है विदा की बातें, यादों की गठरी में लिए अनगिनत यादें, कहती हैं अलविदा ! http://jayaka-rosegarden.blogspot.in/2012/05/blog-post_10.html
भला ऐसे कोई जाने देगा ?
अभी तो बहुत कुछ कहना है
तुम्हें भी,हमें भी - जाना तो है ही, अभी नहीं -
कलम की उदासी का ख्याल करो
कितने नए घोंसले बने हैं
उन चीड़ों का ख्याल करो ....

विद्यालय से निकल भले ही तुम नौकरी करो, कुछ भी बन जाओ...पर ज़िन्दगी की पाठशाला से मुक्ति नहीं मिलती, नहीं मिलती मुक्ति सवालों से -
छल,छद्म,सत्य,झूठ...सबके सवाल होते हैं
तुम चाहो न चाहो अभिमन्यु बनकर रहना पड़ता है
हर बार मरकर जीना पड़ता है
अनुत्तरित सवालों के हल जब तक ना मिलें
मुक्ति कहाँ संभव है !.... निवेदिता और उनकी उलझनें http://nivedita-myspace.blogspot.in/2012/09/blog-post_12.html

ख्वाब है तो हकीकत है
ख्वाब है तो उसे टूटना भी है
ख्वाब है तो उम्मीदें हैं
ख्वाब है तो रुदन है ...
मीता पन्त कहती हैं - ख्वाब देखो तो ना भूलो http://meetapant-dreams.blogspot.in/2012/09/blog-post_11.html
मत भूलो कि कुछ भी हो सकता है !

बीजारोपण ही कर्त्तव्य की इति नहीं... बीज शिशु हो,प्रेम हो,दायित्व हो,रक्षा का हो,किसी भी आरम्भ का हो...उसके प्रति सजगता,उसकी समुचित देखभाल,समय पर सिंचन,काट-छांट, उर्वरक खाद क्षमता ज़रूरी है. सुराही खरीद लेने मात्र से प्यास बुझ जाए तो क्या बात है !
डॉ गायत्री गुप्ता 'गुंजन' की रचना http://drgayatrigunjan.blogspot.in/2012/09/blog-post_12.html ऐसे ही एहसासों का ज़िक्र करती है

दिया नहीं
खाद समय का...
सींचा नहीं
स्नेह के जल से...
समाधान नहीं खोजा
जगह-२ उग आये
प्रश्न रुपी
खरपतवार का...
फिर
कैसे तुम्हें
इत्मीनान है कि
उगेंगे
भरोसे के एहसासात
सुकून की डाली पर.....!!....


आज की स्थिति,हर तरफ गुहार है,फिर भी समय .... क्या समय उदासीन है?या तख़्त पर बैठा तथाकथित मसीहा? कोशिशें जारी हैं कहने की,कभी कविता,कभी आलेख, कभी ग़ज़ल,कभी फिल्म, कभी नाटक... यही कोशिश है दिगम्बर नासवा की इस ग़ज़ल में

काल के परिवर्तन के साथ सच अपना स्वरुप खोता गया,संबंध अपने मायने खोते गए . आध्यात्म को अनावृत कर सबने अपने अनुसार
बना लिया-प्यार,व्यभिचार सब एक ही सांचे में ..... कहाँ संभव है ! प्रेम तो बस प्रेम होता है,अश्लीलता से पृथक ... कृष्ण को आज भी नहीं कहना होगा कि मैं कृष्ण हूँ ...
सत्य तो जंगल में भटक भी जाए तो अपना वजूद नहीं खोता - आज के परिवेश में सांसारिक रंगमंच पर नाटक खेल लेने से कोई पात्र ईश्वर नहीं हो जाता .
पूनम सिन्हा का यही रोष इस आलेख में है, जो सत्य और असत्य का फर्क बताती है http://punamsinhajgd.blogspot.in/2012/08/blog-post_30.html
राधा और कृष्ण....प्रेम की भावना....एक चेतना स्वरुप...एक दूसरे में समाहित...! प्रेम की वह धारा जो बाहर बहते-बहते अंतर्मुखी हो जाए...जिससे इंसान पूर्णत: प्रेम स्वरुप हो जाए...वह राधा....जो हर इंसान के अंदर है...थोड़ा कम...थोड़ा ज्यादा....लेकिन है सबमें...!!
बस एक इंसान ही है जो इसका भी वर्गीकरण कर लेता है....!

जीवन प्रतिपल सरकता है, हर उम्र में कुछ हाथ से छूट जाता है,खो जाता है - और खोने की बेचैनी,दर्द अपना अपना होता है.उम्र की बात है- वह चौकलेट हो,या गुड़िया,या कलम,या .......रिश्ते !
संजय भास्कर ने इसी मर्म और ख़ुशी को अभिव्यक्त किया है - http://sanjaybhaskar.blogspot.in/2012/08/blog-post_30.html
खोयी चीज का मिलना और कभी ना मिलना - अलग अलग अनुभव देते हैं .

इन तमाम अभिव्यक्तियों में एक तप है,बिना तप,ध्यान-गहरे विचार नहीं बनते ..... विचारों की अन्य बानगियों के साथ मिलती हूँ फिर- तब तक इन अटल अभिव्यक्तियों से गुजरें ....

बुधवार, 12 सितंबर 2012

अपनी कहो कुछ मेरी सुनो



जन्म लेते.... मृत्युपर्यंत, शुरू होती है एक अंतहीन यात्रा . कभी धूप, नहीं नहीं अधिक धूप,दर्द,धोखा....तब होता है अनुभवों का सिलसिला,हर बार
कुछ नया,सोच से परे,स्तब्ध करनेवाले ... ऐसे ही अनुभवों की अभिव्यक्ति के साथ मिलते है कालीपद प्रसाद से http://kpk-vichar.blogspot.in/2012/09/blog-post_10.html
के विचारों की भूमि पर -
न जाने कितने बार सोया
कितने बार जागा
कुछ भी याद नहीं मुझको।
पर एक बात मुझे याद है ...
"हर बार जब सोकर उठता हूँ
अपने को एक नये लिबास में ,
और एक नया रास्ते में पाता हूँ।" .... हर बार एक नया रास्ता, नए संकल्प, घबरायी सी मनःस्थिति ....


क्षितिजा - जो भ्रम से परे सत्य है...जहाँ हमारी पहुँच नहीं, उसे न भ्रम कह सकते हैं न असत्य ...रमाकांत की क्षितिजा कभी प्रेयसी,कभी परछाईं सी -
जो बनी रहना चाहती है क्षितिजा अपने अंदाज में ...

यादों की शक्ल कभी चाँद सी,कभी सांझ सी,कभी कौतुहल, कभी निराशाजनक ...
http://rajeshakaltara.blogspot.in/2012/09/blog-post.html इसमें कवि राजेश सिंह ने यादों के नश्वर शरीर को जुगनू सा प्रतिविम्बित
किया है,जो छिपकिली का ग्रास यानि समय का ग्रास बनने को अग्रसर है ...

एहसासों का सागर और उसकी लहरें .... कभी जीवंत,कभी व्याकुल,कभी भयाक्रांत - http://ehsaaskasaagar.blogspot.in/2012/09/blog-post.html
कहता हूँ जो जी चाहे करता हूँ ...
चाहता हूँ अच्छा,
अच्छे की चाह में पल पल मरता हूँ !
हार कर एक दिन टूट कर बिखर जाउंगा ......
सोच सोच तनहईयों मैं आह भरता हूँ !
मैं डरता हूँ ............ कितनी बड़ी सच्चाई है, टूटा हुआ आदमी भी चलता है,पर एकांत में अनगिनत संभावनाओं की सोच से डरता है !

आदमी का चेहरा और आदमी का मन - उदासीन चेहरा मरने की सोच रहा है या जीवन की सही दिशा ढूँढने में चिन्तनशील है,इसे अक्षरशः कहना संभव नहीं,
सही भी नहीं . आक्रोश के भी अलग अलग मायने होते हैं - कोई मारने मिटाने की सोचता है, कोई मरने की , कोई अपनी गलती पर, कोई चूक जाने पर
आक्रोशित होता है . फेसबुक का एक ऐसा ही नज़रिया अर्चना राज जी के शब्दों में -


वैसे...तुम जो चाहे करो
तुम्हारे कदम से
न मेरा प्रेम विवादित होगा
न मेरी ख़ामोशी मेरी व्यथा तुम्हें समझा सकेगी
....... यह जो है
सिर्फ मेरा है .... सोनिया बहुखंडी गौड़ की सोच व्यथा कई संभावनाओं को उकेरती है -
वैसे विवादित विषय अमर हो जाते हैं, तो चलो प्रेम को अमर होने दो ...

सीता की पीड़ा - जनक की बेटी अवध की रानी सीता भटकी वन वन में
राह अकेली रात अँधेरी ........ पर कैसे समझोगे इस पीड़ा को तर्क की कसौटी पर या सिर्फ राम की मर्यादा को
सोचकर !!!स्नील शेखर और http://snielshekhar.blogspot.in/2012/07/blog-post_9393.html

भाव कभी आँगन में कभी आकाश में तो कभी पाताल में और लेखक .... साथ साथ .........
उनींदी आँखों को भला लगता है जब धूप का एक टुकड़ा प्रातः संगीत बन आँगन में, दहलीज पर, छत पर, खिड़कियों से छनकर कमरे में आता है
और आंखमिचौली खेलता है . धूप कभी यहाँ तो कभी वहाँ ..... तो कभी बिल्कुल पास एकाकार होता माही के एक टुकड़े धूप जैसा -


ज़रूरी नहीं कि सबकुछ देखा ही जाए,सुना ही जाए .... स्थिति गंभीर है . बेहतर हा अमल कीजिये संतोष त्रिवेदी की इस बात पर, जो देखन में छोटन
लगे,पर घाव करे, यानि सीख दे गंभीर http://www.santoshtrivedi.com/2012/09/blog-post_10.html


मेहंदी लड़की का सौन्दर्य,दुल्हन की नजाकत, सौभाग्य प्रतीक ... कभी यही मेहंदी चपल चाल बनती है, कभी आँखों के पानी से धुल जाती है...
पूनम कासलीवाल और उनकी अभिव्यक्ति http://kasliwalpoonam.blogspot.in/2012/09/blog-post.html


वंदना के साथ चलना होगा नदी तक ... भावनाओं की गहराई तक जाना तो होगा न http://vandana-kuchhkahe.blogspot.in/2012/09/blog-post_10.html
संशय,अवचेतना से आगे शिवाकार लेती नदी की चाल से रूबरू होना होगा ...
क्या यहाँ कोई द्वार है
आस्था का
चेतना विश्वास का
क्या द्वार के पार
बहती होगी कोई नदी
पत्थरों को
शिवाकार बनाती हुई
तो चलो ...
नदी तक चलें ....


फिर वही ज़िन्दगी,फिर वही घुमावदार रास्ते, फिर वही भूलभुलैया,वही प्रश्न-क्या खोया क्या पाया ... मंटू कुमार के मन के कोने से भी
यही आवाज़ आ रही है - http://mannkekonese.blogspot.in/2012/09/blog-post_9.html
पहले कच्चे घर मे,
पक्के दिल वाले मिलते थे
अब पक्के घर मे कच्चे दिल वाले मिलते हैं,यहाँ
ये मै कहाँ आ गया...
हँसते-मुस्कुराते चेहरे बेशक लगते हैं प्यारे,
पर मुस्कुराहट के पीछे अब
कोई मतलब जुड़ा है,यहाँ
ये मै कहाँ आ गया... निरुत्तर है मन,निरुत्तर दिशाएं,निरुत्तर मुखौटे , ............... कहो कहाँ जाएँ ?

कोई राह तलाशती हूँ और आती हूँ फिर यह कहने कि अपनी कहो कुछ मेरी सुनो ....