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शुक्रवार, 28 सितंबर 2012

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजे ...8



प्यार में शब्दों को कभी छूकर देखा है 
आँखों में काजल की तरह भरा है
भीड़ के भय में उसका संरक्षण महसूस किया है
उड़ते बादलों की धवलता में उसे पाया है
चिड़िया के बेफिक्र गान में सुना है 
ऊँचे टीले से उसकी पुकार सुनी है 
ख़ामोशी में उसे मुखर पाया है 
प्यार की कहानी में पात्रों की परिधि में 
खुद को देखा है ?????
देखा है
जाना है
पाया है - तो यकीन करो
यही प्यार है :)


इसी प्यार के खुमार में -


पता नहीं क्यूँ 
मन हो रहा है 
इस वक़्त 
एक सुलगी सी कविता लिखने का 
कुछ - कुछ मुझ जैसी
मेरे प्यार के जैसी .. १७ साला 
या एक coffee house में 
एक ग्लास पानी के जैसी
जो मेरे होठों से लग कर 
गुजरी थी .. तुमसे ही कहीं 
पता नहीं क्यूँ 
मन हो रहा है इस वक़्त 
एक नीले रंग की साड़ी पहनने का 
खारे पानी के जैसी .. नमकीन स्वाद वाली 
जिसे पहने देख कभी तुम्हारा दिल करा था 
मुझे गले लगाने का 
तब शायद तुम्हारे गर्दन पर ठहरे 
उस काले तिल को छू पाती मैं 
अपनी सुलगी सांसों से तुम्हें .. ख़त्म कर पाती मैं
जिंदा रहने की ख्वाइश तुममें .. कहीं जगा पाती मैं 

और खुद भी जी पाती 
उम्र भर के लिए 
बिना सुलगे ..
बिना बिखरे ..

मंजीत  ठाकुर  - http://gustakh.blogspot.in/

प्यार,
प्यार कोई पाखी तो नहीं,
कि तुमने गुलेल चलाया..
और फुर्र-से उड़ गया वो।

प्यार,
प्यार कोई रोटी तो नहीं,
तुमने पकाया-खाया,
और फट् से फना हो गया वो।

प्यार,
प्यार कोई शब्द तो नहीं,
तुमने पूछा, मैंने बताया
और शब्दकोष या स्क्रीन पर,
चस्पां हो गया वो।

प्यार,
प्यार तो कोई बीज है शायद,
उस पेड़ की, जिसकी जड़े बडी गहरी हैं,
हममें-तुममें जो नदी के वेग-सा समाया है,
हमारा-तुम्हारा असली सरमाया है।

कृष्ण बिहारी - http://swaarth.wordpress.com/2011/01/01/shashwatrahegapyar/

तुम्हे देखने के लिये 
कभी पीछे नहीं मुड़ा मैं
गुजरते वक्त्त के साथ-साथ
तुम चलती रही हो साथ ही मेरे
एक परछाई की तरह
सम – विषम राहों पर।

दूरियों का भी मुझे
कभी हुआ नहीं एहसास
ऎसा भी लगा नहीं कभी
कि तुम नहीं हो मेरे पास
तुम्हारी याद रह रही है
मेरे साथ
एक सघन विश्वास की तरह
आस्था बनकर।

तुम्हारे लिखे प्रेम-पत्रों को
इसलिये नहीं पढ़ता बार-बार
कि तुम्हारी याद को
रखना है ताजा
नहीं ऐसा नहीं है…
पत्र नहीं पढ़ता हूँ मैं
तुम्हे पढ़ता हूँ
एक महाकाव्य की तरह
जिज्ञासु होकर
और पाता रहता हूँ ब्रहमानंद।

अरसा गुजरने के बाद भी
भूल पाता है कोई
एक बार बस गई मेंहदी की गंध
अपनी आत्मा में रचाकर, बसाकर।

तुम मीरा हो, राधा हो
मेरे लिये
परकाया प्रवेश की तरह
उतरती हो तुम उनमें
और इच्छा धारियों की तरह
मेरा प्रेम
धरता रहा है रुप
ढ़ालता रहा है स्वयं को
तुम्हारे अनुरुप
होता रहा है युवा और नवीन
आने वाली पीढ़ियों के लिये
एक अमिट अनुभव की तरह
थाती बनाकर।

किसी को यकीन दिलाने का
कसमें खाने का
प्रश्न ही नहीं उठता
क्योंकि
मरकर भी प्रेम
कभी नहीं मरता
शाश्वत है
और शाश्वत रहेगा प्यार
धरती पर।

प्यार न मिटा है,न मिटेगा .......... क्रमशः 

बुधवार, 26 सितंबर 2012

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजे ...7



प्रेम से जब भी मुलाकात होती है
वह एक गीत बन हवाओं में बिखर जाता है कुछ यूँ -
बस एक क्लिक और कुहू गुप्ता की आवाज़ का जादू कहेगा 
'चलो तुमको लेकर चलें.....'

बोझिल आँखें,खुमार सी मुस्कुराहट और 

प्रियंकाभिलाषी - http://priyankaabhilaashi.blogspot.in/

तुम्हारा प्यार..
एकदम जिद्दी..
बिलकुल मुसलाधार बारिश जैसा..
कितना ही बचने की कोशिश करो..
रीत जाता है..
रूह की सतह तक..!!

ओम पुरोहित'कागद' - http://omkagad.blogspot.in/

एक लड़के से
एक लड़की मिली
दोनों में क्या बात हुई
इस पर
बातें घड़ी गई
बातें बनाई गई

बातें उड़ाई गई


बातें बिगाड़ी गई
बातें बिगड़ीं तो
बातें चलाई गई
बातें चल गईं तो
बात बिठाई गई
बात बैठ गई तो
बात बन गई 
बात बन गई तो
बात जमीं नहीं
बात जमी नहीं तो
बात समझाई गई 
बात मगर थमी नहीं
युग बीत गए
बात किस्सा बन गई
किस्से चल निकले तो
प्रेम कहानी कहलाए
फिर तो वही प्रेम 
उदाहरण बन गया
मंदिर-मज़ार भी बने
किस्से सुनाए जाने लगे
कहानी पढ़ी जाने लगी
उदाहरण दिए जाने लगे
शीश नवाए जाने लगे
चादरें चढ़ने लगीं
मेले सजने लगे 
प्रेम पर मगर
पाबंदी यथावत रही ।

आज भी 
प्रेम उचकता है
कान उठते हैं
जुबान चलती है
बातें निकलती हैं
प्रेम मगर थमता नहीं ।
प्रेम एक सफर है
बातों पर ही
हो कर सवार
शायद आया है प्रेम
इस सदी तक !


आरज़ू है,तमन्ना है,
ख्वाइश है, चाहत है,
तुझी से न जाने क्यों,
हमे इतनी मोहब्बत है।

सरोबार हर धड़कन मेरी
तेरे ही नाम से,
गहराई इस लगी की अब,
हर सांस तेरी इबादत है...

....................................................

प्यार ही जन्म है,प्यार मृत्यु,प्यार तर्पण,............प्यार के बगैर न सृष्टि,न आदिशक्ति ..... 
प्यार तर्क से परे है
वह प्रश्न है ही नहीं
वह एक निनाद है
जो निरंतर मुखरित है
बकवास करते हैं लोग
जो कहते है कि प्यार कहने की चीज नहीं...
प्यार कोई चीज नहीं
प्यार ॐ है
ॐ के बगैर जीवन नहीं
प्रेम के बगैर ॐ नहीं ......               क्रमशः 

सोमवार, 24 सितंबर 2012

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजे ...6




चाँद झील में उतर
नर्म दूबों पर चलने को आतुर है....
सितारे गलीचों की शक्ल ले
मचल रहे हैं....
ख़्वाबों के मेले ने
गुल खिलाये हैं
कोई गुनगुना रहा है.....................
सुना था,
अम्बर पे अनहोनी
नज़र आती है
आज देखा और
महसूस किया है...........
फूलों की बारिश में
अमृत भी छलका है,
ढोलक की थाप पर
मन ये धड़का है....
धरती का रोम-रोम
गोकुल बन बैठा है !..............

प्यार अमरनाथ,प्यार गोकुळ,प्यार मथुरा,प्यार चनाब,प्यार सरहदों के आर-पार..... 
कभी दर्द ये देता है,कभी ख़ुशी.......

आराधना'मुक्ति' - http://feministpoems.blogspot.in/

मेरी ज़िन्दगी में तुम्हारे आने से
कुछ बदल गया है
बदल गये हैं गीतों के मायने
वो मन की गहराइयों तक
उतरने लगे हैं
देने लगे हैं आवाज़
मेरी भावनाओं को
मानो मेरी ही बातें
कहने लगे हैं,
बदल गया है मौसम का अन्दाज़
वो बातें करता है मुझसे
चिड़ियों के चहकने से
बारिश के रिमझिम से
मेरे साथ हँसता-रोता है मौसम
पहले सा नहीं रहा,
बदल गयी मेरे पाँवों की थिरकन
मेरा बोलना, मेरा देखना
मैं खुद को ही अब
पहचान नहीं पाती
सब बदल गया है,
मेरी ज़िन्दगी में तुम्हारे आने से
कुछ नया हुआ है
पहले की तरह अब
नहीं लगता डर मुझे
पुरुषों पर
कुछ-कुछ विश्वास हो चला है.

अंजू चौधरी - http://apnokasath.blogspot.in/

प्यार .......ये वोह शब्द है जो अधूरा होते हुए भी अपने आप मे..पूर्ण है
प्रेम अजेर अमर है !गंगा जल समान ...प्रेम राधा है ..प्रेम मीरा है ....प्यार वोह प्याला है
जिस ने पिया ...बस उस का रसपान वही जाने !भीड़ मे प्यार है जिस के साथ वोह फिर भी अकेला है ...और अकलेपन में है साथी उसका प्यार...सच्चा प्यार उस मोती समान ॥जो सुच्चा है पवित्र है ..........प्यार को परिभाषित ना करो दोस्तों ......ये अपनेआप मे है पूर्ण ..........
...............................................................................................................................

आँखों के रस्ते से जो दिल में उतरे हो ,
वही बसेरा तुमने बना लिया ,
चाहू या ना चाहू मै ,
फिर भी मेरा साथ तू ने पा लिया है ,
ये प्रेम की डगर पर मुझे साथ ले कर ,
चले हो मेरे मन के मीत ,
चलना साथ..........
देखो कही ......
भटक ना जायू...अटक ना जायू ...खो ना जायू ,
इस दुनिया की भीड़ में ..
हे ! मेरे मीत ,प्रेम के गीत ,
दे कर अपनी आवाज़ ....
डालना मेरे पैरो में प्यार की बेडियाँ ,
मेरे चेतन तन और अव् चेतन मन में ,
तूने दिया तीन शब्द का गीत,
सत्यम,शिवम् ,सुन्दरम ...........
जिसने मुझे किया इस प्रेम मै पवित्र ......
प्रेम की परिभाषा में मेरा ,
तन तो राह साथ पर ,मन खोया हर बार !
थामना अब .......
क्यूंकि अब तो तन और मन की भाषा बदली सी है ,
इस जीवन को मान के नाटक ...
दिया है सोंप अब तुझे ,
चाहे कठपुतली बना नचा ले ,
या दे मुझे भी ,सबकी नज़रो मे सम्मान ...
ना दौलत का नशा ,ना है धन की है चाह मुझे
मिले जो तुझे से सच्चा प्यार ..
बस वही है मेरा अपना ........
बस वही है मेरा अपना ...............
आँखों के रस्ते से जो दिल में उतरे हो ,

मार्क राय - http://markrai.blogspot.in/

तुम जो कहो
उसे प्रकाशित कर दूँ
अपने सर्वस्व को
तुम पर न्योछावर कर दूँ
अपनी समस्त ऊर्जा को
विश्रित कर दूँ
तुम जो कहो
अपने स्पर्श से
तुझे उष्मित कर दूँ
तेरे दर्द को ओढ़कर
ख़ुद को
धन्य कर दूँ
तुम जो कहो
तुझ पर जीवन
अर्पण कर दूँ
तेरे चेहरे का गुलाल
और लाल कर दूँ
दमकते सूरज को
निहाल कर दूँ
तुम जो कहो
दिन हो या रात
धुप हो या छांव
तेरे कदमों में
सर रख दूँ
तुम जो कहो

डा. रमा द्विवेदी - http://ramadwivedi.wordpress.com/

खुदा ने अगर दिल मिलाये न होते
तो तुम तुम न होते हम हम न होते|

न यह हिम पिघलता न नदियां ये बहती
न नदियां मचलती न सागर में मिलती।
सागर की बाहों में गर समाये न होते
तो तुम तुम न होते हम हम न होते |

न साग्र यह तपता न बादल ये बनते
न बादल पिघलते न जलकण बरसते
जलकण धरा मे गर समाये न होते
तो तुम तुम न होते हम हम न होते |

न रितुयें बदलती न ये फूल खिलते
न तितली बहकती naभौरे मचलते
अगर प्यार के ये झरोखे न होते
तो तुम तुम न होते हम हम न होते

खुदा ने अगर दिल मिलाये न होते
तो तुम तुम न होते हम हम न होते |


................ प्यार - एक ख़ामोशी है,सुनती है कहा करती है ....... कहती रहेगी,आप सुनिए .... 
कल भी
आज भी 
आज भी
कल भी...........क्रमशः 

रविवार, 23 सितंबर 2012

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजे ...5




कलकल की साज पर
नन्हीं बूंदों की बारिश
और तुम्हारी याद...........
बिल्कुल कॉफी-सी लगती है !
तेज हवाएं,
ठिठुरती शाम
और तुम्हारी याद........
बिल्कुल अंगीठी-सी लगती है !
रुई से उड़ते बर्फ,
बर्फ की चादर
और तुम्हारी याद..........
बिल्कुल जन्नत-सी लगती है !
कहो तो -
कौन हो तुम ???.................

कोई छुवन,कोई सिहरन,कोई धुन,कोई गीत,कोई आवाज़.............या है प्यार !साँसों की संजीवनी है प्यार - 
तभी कहती हैं ...

सरस्वती प्रसाद - http://kalpvriksha-amma.blogspot.in/

सुबह,दोपहर,शाम,
और रात के रंग में रंगी
-समय की चादर,
बिना रुके सरकती जा रही हैं.....
धडकनों के अहर्निश ताल पर,
किसी अज्ञात नशे में झूमती,
ज़िंदगी थिरकती जा रही हैं.....
आगे बढ़ो,
जी चाहे जिस रंग से,
चादर पर अपना नाम लिख दो ,
जीवन-पात्र में ,
प्राणों की बाती डालकर,
नेह से भर दो.......
लौ उकसाओ,
और रंगों की मूल पहचान सीख लो,
इसी ज्योति में वो सारी तस्वीरें,
कहीं-न-कहीं दिखेंगी-
जो तुम्हारे आस-पास हैं...
देर मत करना,
वरना चूक जाओगे...
समय का क्या हैं,
उसके चरण नहीं थमते,
भूले से भी किसी का
इंतज़ार नहीं करते...
जीने के लिए मेरे प्रियवर ,
मन को अनुराग रंग में रंग लो..............
यह मेरी सीख नहीं,
प्यार भरा उपहार हैं!

उपासना सियाग - http://usiag.blogspot.in/

कहते हैं कि जब कोई प्रेम
 में होता है तो 
उसे आसमान का रंग
 नीले से बैंगनी या गुलाबी 
नज़र आने लगता है ......
पर यह भी तो कहा जाता है 
के जब कोई प्रेम 
में होता है तो उसे कुछ भी 
नज़र नहीं आता ,
प्यार  अँधा होता है 
और  उसे अपने प्रिय के
 सिवाय कुछ भी तो दिखाई
 देता नहीं है
 तो फिर ये रंग ,कैसे भी हो
 क्या फर्क पड़ता है .........
वह तो बस अपनी आँखों में 
अपने प्रिय की छवि को बसाये 
पलके मूंदे रखता है ........
अँधा नहीं बनता वह,
 बस कहीं अपने प्रिय की छवि 
उसकी आँखों से दूर ना हो इसीलिए 
उन्हें मूंदे रखता है ........

 शांतनु सान्याल - http://sanyalsduniya2.blogspot.in/

उस सजल नयन के तीर बसे हैं कदाचित 
चमकीले बूंदों की बस्तियां, 
साँझ ढले 
ख़ुश्बुओं के जुगनू जैसे उड़ चले हों 
दूर अरण्य पथ में, 
अंत प्रहर के स्वप्न की तरह, 
बहुत ही नाज़ुक, 
कोई प्रणय गीत लिख गया 
शायद मन -
दर्पण में भोर से पहले, 
तभी खिल चले हैं भावना के कुसुम, 
सूर्य उगने से पहले, 
न जाने कौन छू सा गया 
लाजवंती के पल्लव,
कांपते अधर से गिर चले हैं शिशिर कण,
या उसने छुआ हैं अंतर्मन - -

 निधि टंडन - http://zindaginaamaa.blogspot.in/

खुद ब खुद आ जाता है
बिन बुलाए ...
बिन खटखटाए ..
बिन कहे ...
बिन सुने ...
आना ही धर्म है जिसका
छा जाना ही कर्म है जिसका

अजब बदतमीज़ होता है न प्यार .             

:) प्यार में क्या नहीं कह जाते हम , इस प्यार को मैं क्या नाम दूँ .......................... क्रमशः 

शनिवार, 22 सितंबर 2012

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजे ...4




बालू के घरौंदे ...
छप छप होती लहरें
किसी नन्हीं चिड़िया का इधर उधर देखना
चलते चलते हाथ पकड़ यूँ ही मुस्कुराना
अचानक बारिश की बूंदों से भीगना
तवे पर किसी के लिए रोटियाँ सिंकना .... प्यार होता तो यही है !
....
कहते हैं लोग ताजमहल है प्यार का प्रतीक !!!
एक अदभुत ईमारत है ज़रूर
अदभुत दृश्य .... पर प्यार !
.....
प्यार तो टूटी झोपडी में होता है
जब टपकती बूंदों के आगे कोई टूटा बर्तन रख देता है
नींद न खुले - इस एहसास के साथ ...
प्यार तो खट्टे टिकोलों में भी होता है
परछाइयों से खेलने में होता है
....
एक बात कहूँ -
प्यार भगवान् है
वह हर हाल में साथ होता है ...

तभी तो प्यार में डूबा अस्तित्व महान यज्ञ होता है,स्नेहिल घी से इसकी लपटें उद्दत होती हैं ... इन्हीं लपटों की बानगी है मेरी कलम में - 

-दिव्या शुक्ला - http://divya-shukla.blogspot.in/

कभी किन्ही मधुर पलों में
तुमने मुझसे कहा
चंदन की गंध क्यूँ फूटती है
तुम्हारी चंदनवर्णी देह से
खिलखिला कर मै -----
जोर से हंस बैठी --और बोली
मुझे चंदन बहुत प्रिय है न
उसे आत्मसात कर लिया मैने
कुछ वैसे ही जैसे तुम्हे -एवं
तुम्हारे अस्तित्व को --भी
- जो -मुझमें ही विलीन है
और ये ही सत्य है ------
जिसे अंतस से चाहो
वह आत्मसात हो ही जाता है
सुषमा  'आहुति' - http://sushma-aahuti.blogspot.in/

मुझे नही पता की प्यार क्या होता है
प्यार को समझने के लिए कोई
 बहुत-बहुत बड़े-बड़े ग्रन्थ नही पढ़े मैंने 
प्यार को व्यक्त करने के लिए कोई
 बड़े-बड़े शब्द भी नही मिले मुझे
मुझे तो सिर्फ इतना पता है...
किसी का ख्याल चुपके से होटों पे मुस्कान ला देता है
कोई हवा का झोका छू कर गुजरता है
तो किसी के होने का एहसास दिला देता है
जिसके लिए सिर्फ हम दिल से सोचते है
 शायद ऐसा ही प्यार होता है.. !!!

अनुपमा पाठक - http://www.anusheel.in/

एक पावन 
एहसास से 
बंध कर 
जी लेते हैं! 
मिले 
जो भी गम 
सहर्ष 
पी लेते हैं! 
क्यूंकि- 
प्रेम 
देता है 
वो शक्ति 
जो- 
पर्वत सी 
पीर को.. 
रजकण 
बता देती है! 
जीवन की 
दुर्गम राहों को.. 
सुगम 
बना देती है! 

बस यह प्रेम 
अक्षुण्ण रहे 
प्रार्थना में 
कह लेते हैं! 
भावनाओं के 
गगन पर 
बादलों संग 
बह लेते हैं! 
क्यूंकि- 
प्रेम देता है 
वो निश्छल ऊँचाई 
जो- 
विस्तार को 
अपने आँचल का.. 
श्रृंगार 
बता देती है! 
जिस गुलशन में 
ठहर जाये 
सुख का संसार 
बसा देती है! 

रीना मौर्य - http://mauryareena.blogspot.in/

खुद में ढूंढ़ती हूँ तुम्हें......
तुम्हारी अदा को अपनी अदा बनाकर 
खुद में ढूंढ़ती हूँ तुम्हें........
तुम्हारी मुस्कान को अपने चेहरे पर सजाकर 
खुद में ढूंढ़ती हूँ तुम्हें.......
तुम्हारी जिम्मेदारियों को अपने कंधे पर उठाकर 
खुद में ढूंढ़ती हूँ तुम्हें.......
आईने के सामने घंटों खड़े रहकर 
अपने बालों को सवांरना
खुद को आईने में निहारना....
अब तो ये सब मैंने भी सिख लिया है
आसमानी रंग की शर्ट पहनकर 
आसमान को देखते रहना
जाने क्या सुकून मिलता था तुम्हें इसमे
पर अब देखो मै भी आसमानी रंग की साड़ी पहनकर 
घंटों आसमान को देखती हूँ 
 और खुद में ढूंढ़ती हूँ तुम्हें.....
तुम्हारी आदतों को अपना बनाकर 
तुम्हारी खुशबू को खुद में बसाकर 
ढूंढ़ती हूँ तुम्हें........
और अब लगता है मेरी तलाश पूरी भी हो गयी है
तभी तो ये आसमानी रंग 
ये खुशबू 
ये ज़िम्मेदारियाँ 
तुम्हारी मुस्कान
सब मुझे भी तो भाते है...
क्यूंकि तुम कहीं नहीं गए हो 
तुम मुझमे बसे हो......
मुझमे बसे हो सदा के लिये .....

शुक्रवार, 21 सितंबर 2012

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजे ...3



लिखी नहीं प्रेम कविता
भला लिखी कहाँ जाती है 
यह तो चाँदनी है 
जो चाँद के दिल से झरती है 
लहरें हैं
जो समंदर के दिल से निकलती है
है चातक की चाह
पपीहे की आह
कोयल की कूक
दूरी में हूक 
छत पर नंगे पाँव की दौड़
परदे के पीछे की धड्कनें...
नहीं लगती भूख
सूखता है गला
पर बुझती नहीं प्यास 
प्यास बढ़ती है इक झलक पाकर
रूठने की नजाकत है
सामने आकर...
नहीं खुलते होठ
प्यार बयां नहीं होता 
प्रेम कहकर भी 
इसका इज़हार नहीं होता 
प्रेम-एक अनकही छुवन है
जिसकी आगोश से कोई जुदा नहीं होता ...
.........................................................................
गौर फरमाइए  कतील शिफाई की इन लकीरों पर ...
अपने हाथों की लकीरों में बसा लो मुझको,
मैं हूँ तेरा तो नसीब अपना बना लो मुझको।
मुझसे तू पूछने आया है वफा के मायने,
यह तेरी सादादिली मार न डाले मुझको।
खुद को मैं कहीं बाँट न लूँ दामन – दामन,
कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको।......

सादगी ही तो है सरस दरबारी के एहसास में - http://merehissekidhoop-saras.blogspot.in/

मैंने तो कभी प्रेम कविता लिखी ही नहीं !
आज तक जो भी लिखा -
तुम से ही जुड़ा था  -
उसमें विरह था ...दूरियां थीं...शिकायतें थीं..
इंतज़ार था ...यादें थीं..
लेकिन प्रेम  जैसा कुछ भी नहीं ....
हो सकता है वे जादुई शब्द
हमने एक दूसरे से कभी कहे ही नहीं-
लेकिन हर उस पल जब एक दूसरे की ज़रुरत थी ...
हम थे...
नींद  में अक्सर तुम्हारा हाथ खींचकर ...
सिरहाना बना  ..आश्वस्त  हो सोई  हूँ .....
तुम्हारे घर देर से पहुँचने पर बैचैनी ...
और पहुँचते ही महायुद्ध !
तुम्हारे कहे बगैर -
तुम्हारी चिंताएं टोह लेना-
और तुम्हारा उन्हें यथा संभव छिपाना
हर जन्म दिन पर रजनी गंधा और एक कार्ड ...
जानते हो उसके बगैर -
मेरा जन्म दिन अधूरा है
हम कभी हाथों में हाथले
चांदनी रातों में नहीं घूमे-
अलबत्ता दूर होने पर
खिड़की की झिरी से चाँद को निहारा ज़रूर है
यही सोचकर की तुम जहाँ भी हो ..
उसे देख मुझे याद कर रहे होगे....
यही तै किया था न -
बरसों पहले
जब महीनों दूर रहने के बाद -
कुछ पलों के लिए मिला करते थे
कितना समय गुज़र गया
लेकिन आदतें आज भी नहीं बदलीं
और इन्ही आदतों में
न जाने कब --
प्यार शुमार हो गया -
चुपके से ...
दबे पाँव.....


तुम्हारे लिए प्यार था
ज़मीं से फलक तक साथ चलने का वादा..
और मैं खेत की मेड़ों पर हाथ थामे चलने को
प्यार कहती रही....
तुम चाँद तारे तोड़ कर
दामन में टांकने की बात को प्यार कहते रहे...
मैं तारों भरे आसमां तले
बेवजह हँसने और बतियाने को
प्यार समझती रही..
तुम सारी दुनिया की सैर करवाने को
प्यार जताना कहते..
मेरे लिए तो पास के मंदिर तक जाकर
संग संग दिया जलाना प्यार था...
तुम्हें मोमबत्ती के रौशनी में
किसी आलीशान होटल में
लज़ीज़ खाना, प्यार लगता था...
मुझे रसोई में साथ बैठ,एक थाली से ,
एक दूजे को
निवाले खिलने में प्यार दिखा...

शहंशाही प्यार था तुम्हारा...
बेशक ताजमहल सा तोहफा देता...
मौत के बाद भी...

मगर मेरी चाहतें तो थी छोटी छोटी...
कच्ची-पक्की ..खट्टी मीठी...चटपटी...
ठीक ही कहते थे तुम...
शायद पागल थी मैं...

डॉ चेतन भंडारी - http://6tann.blogspot.in/

प्यार ...
क्या है यह ?
लफ्ज़ नही है सिर्फ़
जिसे बाँध लिया जाए
किसी सीमा में
और खत्म कर दिया जाए
उसकी अंतहीनता को

प्यार ....
वस्तु भी नही है कोई
यह तो है एक एहसास
एक आश्वासन
जो धीरे धीरे
दिल में उतरता
मुक्त गगन सा विचरता
शब्दों को कविता कर जाता है

प्यार .....
है नयनों में भरा सपना
जो कई अनुरागी रंगो से रंगा
चहकता है पक्षी सा
अंधेरों को उजाले से भरता
नदी सा कल कल करता
बूंद को सागर कर जाता है

प्यार .....
मिलता है सिर्फ़
दिल के उस स्पन्दन पर
जब सारा अस्तित्व मैं से तू हो कर
एक दूजे में खो जाता है
कंटीली राह पर चल कर भी
जीवन को फूलों सा मह्काता है !!...
...................................................................................................प्रेम का लक्ष्य प्रेम है
                                                                                          वह जब भी अपनी प्रत्यंचा खींचता है
                                                                                          दिशाएं पिघलकर नदी की तरह बहती हैं
                                                                                                     और बंजर धरती में
                                                                                                      हरियाली दिखती है ...  
क्रमशः 


गुरुवार, 20 सितंबर 2012

गाहे गाहे इसे पढ़ा कीजे ...2




प्रेम .....
गाहे-गाहे इसे पढ़ा कीजे  
दिल से बेहतर कोई किताब नहीं 
.....
कोई रंग भरो,इसकी आभा की महिमा न जाए बखानी !उपमा,उपमान,उपमेय .... बशीर बद्र की इस रचना में प्रेम के आगे भावनाओं की शोखी है-
ऐ हुस्न-ए-बे-परवाह तुझे शबनम कहूँ शोला कहूँ
फूलों में भी शोख़ी तो है किसको मगर तुझ-सा कहूँ

गेसू उड़े महकी फ़िज़ा जादू करें आँखे तेरी
सोया हुआ मंज़र[1] कहूँ या जागता सपना कहूँ

चंदा की तू है चांदनी लहरों की तू है रागिनी
जान-ए-तमन्ना मैं तुझे क्या- क्या कहूँ क्या न कहूँ...
कहने के क्रम में प्रेम का प्रेम स्वरुप सबके अपने अपने हैं -
ऋता शेखर ‘मधु’ - http://madhurgunjan.blogspot.in/
 
प्रेम एक है कई रूप हैं
कहीं छांव, यह कहीं धूप है
कहीं ये भक्ति कहीं है शक्ति
कहीं विरक्ति तो कहीं आसक्ति|
चमक रही थी चपल दामिनी
अनवरत बारिशों की झड़ी थी
पुत्र-प्रेम में वासुदेव ने
यमुना में ज्यों पांव धरे थे
यमुना क्यों उपलाई थी
पग कान्हा के छूकर उसने
अपनी प्यास बुझाई थी|
वात्सल्य-प्रेम में कान्हा के
यशोदा भी हरषाई थी|
कौन सा था प्रीत कान्हा
कौन सा वह राग था
शायद मधुर सी रागिनी से
बह रहा अनुराग था
बेबस बनी थी राधा प्यारी
लोक-लाज भूली थी सारी|
भक्ति में डूबी थी मीरा
महलों की वह रानी थी
मन के ही एहसास थे उनके
बन गई कृष्ण-दीवानी थीं|
निष्ठुर बने थे मोहन प्यारे
वृंदावन को छोड़ चले
विकल गोपियाँ सुध-बुध खोईं
किस प्रेम में वे थीं रोई|
पितृ-प्रेम में रामचन्द्र ने
वनवास भी स्वीकार किया
परिणीता सीता का पति-प्रेम था
दुर्गम वन अंगीकार किया
भ्रातृ-प्रेम से लक्ष्मण न चूके
उर्मि को विरह का भार दिया|
देख पति की आसक्ति
हाड़ा-रानी विचलित हुई
देश-प्रेम की खातिर उसने
अपने सिर का उपहार दिया
मनु ने झाँसी के प्रेम में
वीरांगना-भेष धार लिया|
पेड़ों से चिपक बहुगुणा ने
वृक्ष-प्रेम का दिया परिचय
जीवों से प्रेम करने का
मनेका का था निश्चय|
संयुक्ता को ले गए स्वयंवर से
प्रेम में कई समर हुए
मन-मंदिर में बसा इक दूजे को
लाला-मजनू अमर हुए|
अमृता की कविता इमरोज
इमरोज के चित्र में अमृता
इस प्रेम का क्या नाम होगा?
नाम से परे
यह एक एहसास है
दूर रहकर भी लगे
वह हमारे पास है
रूह से महसूस करो
चल रही जब तक सांस है
प्रेम की पराकाष्ठा
बन जाता उच्छवास है
प्रेम की बातें मधुरतम
सिर्फ वो ही जानते
जो प्रेम से बढ़कर जगत में
और कुछ ना मानते|
सीमा सिंघल'सदा'- http://sadalikhna.blogspot.in/
प्रेम सदा ही मधुर होता है,
चाहे लिया जाये या दिया जाये
जहां भी होता है यह
वहां विश्‍वास स्‍वयं उपजता है
किसी के कहने या करने
की जरूरत ही नहीं पड़ती
इसके लिए
प्रेम निस्‍वार्थ भाव
कब ले आता है मन में
कब समर्पण जाग जाता है
कब आस्‍था
आत्‍मा में जागृत हो उठती है
और एक ऊर्जा का संचार करती है
तरंगित धमनियां स्‍नेहमय हो
हर आडम्‍बर से परे
सिर्फ स्‍नेह की छाया तले
अपने जीवन को सौंप
अनेकोनेक सोपान पार कर जाती है
बिना थकान का अनुभव किये
मन हर्षित होता है
जीवन में सिर्फ उल्‍लास होता है
रंजो-गम से दूर
उसे सिर्फ एक ही अक्‍स नजर आता है
स्‍नेह का जिसे जितना बांटो
उतना ही बढ़ता है
अमर बेल की तरह .....
जब काम मरता है तब
प्रेम जागृत होता है
जब लोभ मरता है तो
वैराग्‍य का जन्‍म होता है
जब क्रोध का नष्‍ट होता है
तो क्षमा अस्तित्‍व में आती है
और क्षमा के साथ हम
फिर स्‍नेह को समर्पित हो जाते हैं ....!!!

रचना श्रीवास्तव- http://rachana-merikavitayen.blogspot.in/
जब सूरज
कोहरे की चादर ओढ़ सोया हो
शहर पूरा
मध्यम रौशनी में नहाया हो 
थाम मेरा हाथ तुम
नर्म ओस पे
हौले सी चलना
जीवन जब थमने लगे
मायूसी दमन फैलाने लगे
तुम पास बैठ
प्यार में डूबे शब्द फैलाना
नर्म ठंडी बूँदें जो बर्फ़ बने 
रूई-सी सफ़ेदी 
जब हर शय को ढके 
उनमें बनते क़दमों के निशान 
संग मेरे तुम 
दूर तक जाना 
चाय की गर्म प्याली संग 
पुराना एलबम देखना 
पलटना एक एक पेज 
कुछ यों
के यादों के परदे पे
एक तरंग-सी उठ जाए 
उस तरंग में 
तुम मेरे साथ डूबना...
अंजू शर्मा -www.kavitakosh.org/anjusharma
चलो मीत,
चलें दिन और रात की सरहद के पार,
जहाँ तुम रात को दिन कहो 
तो मैं मुस्कुरा दूं,
जहाँ सूरज से तुम्हारी दोस्ती 
बरक़रार रहे 
और चाँद से मेरी नाराज़गी
बदल जाये ओस की बूंदों में,
चलो मीत,
चलें उम्र की उस सीमा के परे
जहाँ दिन, महीने, साल 
वाष्पित हो बदल जाएँ
उड़ते हुए साइबेरियन पंछियों में
और लौट जाएँ सदा के लिए
अपने देश,
चलो मीत,
चलें भावनाओं के उस परबत पर
जहाँ हर बढ़ते कदम पर
पीछे छूट जाये मेरा ऐतराज़ और 
संकोच,
और जब प्रेम शिखर नज़र आने लगे
तो मैं कसके पकड़ लूं तुम्हारा हाथ
मेरे डगमगाते कदम सध जाएँ 
तुम्हारे सहारे पर,
चलो मीत,
कि बंधन अब सुख की परिधि
में बदल चुका है
और उम्मीद की बाहें हर क्षण
बढ़ रही है तुम्हारी ओर,
आओ समेट लें हर सीप को
कि आज सालों बाद स्वाति नक्षत्र 
आने को है,
चलो मीत,
कि मिट जाये फर्क 
मिलन और जुदाई का,
इंतजार के पन्नों पर बिखरी
प्रेम की स्याही सूखने से पहले,
बदल दे उसे मुलाकात की
तस्वीरों में,
चलो मीत,
हर गुजरते पल में
हलके हो जाते हैं समय के पाँव,
और लम्बे हो जाते हैं उसके पंख,
चलो मीत आज बांध लें समय को 
सदा के लिए,
अभी, इसी पल..............
आरक्त चेहरा,खोयी आँखें,बढ़ती धड्कनें,रूकती-चलती साँसें और एक नाम- प्यार का ....
क्रमशः